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राजरंग

वाह रे अपने हनी ब्रदर !ड्ढr अलबत्ते है इ पंजा छाप कंपनी। रहे-रहे बेहोशी से उठ कर बैठती है और मुखिये को आंख दिखाने लगती है। कंपनी में एगो मक्खन साहब हैं। देश की राजधानी से राज्य की राजधानी में चरण धरते ही शुरू हो जाते हैं। किसी का कुछ बिगाड़ तो सकते नहीं, ले-दे कर एगो सीधा-साधा अपने हनी ब्रदर हैं, उन्हीं पर शुरू हो जाते हैं। बेचारे हनी ब्रदर हैं कि कुछ बोलते ही नहीं। चुपचाप सबकी सुनते रहते हैं। अरे का करें बेचारे, सुन-सुन कर उनके भी कान पक गये हैं। छह महीना से सबकी सुनिये तो रहे हैं। सबको देख रहे हैं। कंपनी के दिल्ली बेस्ड नेताजी तो लगातारे बोल रहे हैं, झारखंडियो पीछे नय रहते हैं। मक्खन साहब को देखते ही इनकी भी बांहें फड़कने लगती हैं। जुबां कैंची की तरह चलने लगती है। महीने का उनतीस दिन तो मुखिया जी के आगे-पीछे रह कर काम निकालने से फुरसते नय है। लेकिन मक्खन साहब के आते ही इ लोग गिरगिट की तरह रंग बदल लेते हैं। हनी ब्रदर अपने स्वीट हनी हैं। उ जानते हैं कि कौन-कौन कितनी मात्रा में रेग्युलर हनी का सेवन कर रहा है। जो सेवन कर रहा है, उ भी रंग बदल रहा है। अपने ब्रदर चुपचाप सबकी सुनते रहते हैं और मंद-मंद मुस्कुराते रहते हैं। वाह रे अपने हनी ब्रदर, आपकी बात ही निराली।

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