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खाने में ही जा रहे रुपए चार हजार

यदि आपके ऊपर चार-पाँच लोगों का पेट भरने की जिम्मेदारी है तो कम से कम चार हजार रुपए महीना कमाने की व्यवस्था कर लें। बढ़ती महँगाई के इस दौर मंे साधारण खानपान पर खर्च इतना बढ़ चुका है कि इससे कम कमाने वाले को स्वाद के साथ सेहत से भी समझौता करना पड़ सकता है।ड्ढr बीते पाँच साल मंे महँगाई का ग्राफ बहुत तेजी से ऊपर चढ़ा है। गेहूँ, दाल, चावल, आटा ही नहीं खाद्य तेलों के दाम भी दोगुने के करीब पहुँच गए हैं। बीते छह महीने में ही खाद्य पदाथरे की कीमतों में 25 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई है। इसकी तस्दीक सात फीसदी से ऊपर पहुँच चुकी मुद्रास्फीति (महँगाई) की दर भी करती है। खाद्यान्न की कीमतंे जहाँ दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही हैं वहीं प्रति व्यक्ित आय में महज चार हजार रुपए सालाना का इजाफा हुआ है। दुनिया भर के लोगों की आय का आँकड़ा एकत्र करने वाली संस्था ग्लोबल रिचेस्ट डॉट कॉम के मुताबिक 2006-2007 में देश में प्रति व्यक्ित आय 2पए सालाना यानी 2448 रुपए महीना दर्ज की गई जबकि वर्ष 2005-2006 में यह 25716 रुपए सालाना यानी 2143 रुपए महीना थी। जैसा कि चार्ट में स्पष्ट है कि एक आदर्श शाकाहारी परिवार के खानपान पर मासिक खर्च 4145 रुपए है। इस हिसाब से प्रति व्यक्ित यह खर्च 4145 रुपए का चौथापाँचवा हिस्सा यानी 1036830 रुपए के आसपास बैठेगा। आय का एक तिहाई या उससे अधिक हिस्सा जब खाने पर ही खर्च हो रहा है तो अन्य जरूरतों को कहाँ से पूरा किया जाएगा जबकि मकान किराया या लोन की किश्त, बिजली या फोन बिल, बच्चों की शिक्षा, वस्त्र, चिकित्सा व ट्रांसपोर्ट समेत कुछ आकस्मिक खचरे को पूरा किए बिना गुजारा संभव ही नहीं है।ं

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