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पाटलिपुत्र नाटय़ महोत्सव का उठा पर्दा

नाटक ‘कहानी अभी खत्म नहीं हुई ’ के मंचन के साथ ही रविवार की शाम 23 वें पाटलिपुत्र नाटय़ महोत्सव का पर्दा उठा। वयोवृद्ध रंगकर्मी व अभिनेता प्यारे मोहन सहाय ने एक रंगारंग समारोह में नाटय़ संस्था ‘प्रांगण’ द्वारा आयोजित इस महोत्सव का उद्घाटन किया।ड्ढr ड्ढr इस मौके पर प्रांगण के बाल कलाकारों ने अपनी मनमोहक प्रस्तुतियों से सब नाटय़प्रेमियों का दिल जीत लिया। ओमप्रकाश के मुखौटा नृत्य ‘जट-जटिन’ पर भरपूर ताली बजी। नाटक का आनन्द उठाने काफी संख्या में रंगकर्मी व नाटय़प्रेमी उपस्थित हुए। नाटक देखने वालों में सांसद राम कृपाल यादव, राजद नेता निहोरा प्रसाद यादव, आरएन दास, अखिलेश्वर प्रसाद सिन्हा, प्रेमलता मिश्र प्रेम आदि प्रमुख थे।ड्ढr ड्ढr रंगकर्मी श्री सहाय ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि इस तरह के आयोजनों से रंगमंच व रंगकर्मियों को काफी प्रोत्साहन मिलता है। साथ ही राष्ट्रीय एकता भी मजबूत होती है। मुख्य संरक्षक सांसद श्री यादव ने बताया कि किसी तरह आर्थिक दिक्कतों से जूझते हुए ‘प्रांगण’ 23 वर्षो से यह आयोजन करता रहा है। निहोरा प्रसाद यादव ने दर्शकों की कमी पर चिंता जतायी और कहा कि जैसी स्थिति 74 में थी वैसी ही अब भी है। दूरदर्शन के सहायक निदेशक पीके झा ने भी अपने विचार रखे। प्रांगण के प्रमुख अभय सिन्हा ने बताया कि पांच दिवसीय आयोजन के दौरान बिहार समेत उत्तरप्रदेश, दिल्ली, बंगाल,असम, उड़ीसा, गुजरात,मणिपुर की नाटय़ टीमें शिरकत कर रही है। लगभग साढ़े तीन सौ रंगकर्मी यहां जुट रहे हैं। हर रोज दो नुक्कड़ प्रस्तुतियों के साथ ही दो नाटकों का मंचन होगा। उन्होंने आयोजन में सरकार की तरफ से कोई आर्थिक मदद नहीं मिलने पर चिंता जताते हुए कहा कि इससे सूबे में रंगकर्म को धक्का पहुंचेगा। महज आश्वासन के बल पर उन्होंने सहयोगियों में कला व संस्कृति विभाग को शामिल किया है। कार्यक्रम का संचालन शोमा चक्रवर्ती सिन्हा कर रही थीं।ड्ढr ड्ढr डॉयलोगों पर गूंजती रहीं दर्शकों की तालियां : कला-संस्कृति विभाग, बिहार, संगीत नाटक अकादमी दिल्ली व उत्तर मध्य सांस्कृतिक केन्द्र के सहयोग से आयोजित पाटलिपुत्र नाटय़ महोत्सव की पहली प्रस्तुति अपराजेय निराला, सासाराम की ‘कहानी अभी खत्म नहीं हुई ’ थी। आतंकवादी, नेता व पुलिस की गठजोड़ के आसपास पूरी कहानी घूमती है। एक रिटायर्ड फौजी इसके विरुद्ध संघर्ष करता है। लेखक-निर्देशक विद्याशंकर ने एक इनके जरिए यह बताने की कोशिश की है कि आतंकवाद को किसी संप्रदाय विशेष से जोड़ा नहीं जा सकता है। जैसे ही कालिदास रंगालय के शकुंतला प्रेक्षागृह का पर्दा उठा कि एक भारी भरकम आवाज गूंजती है ‘मैं आतंकवादी हूं। मेरी कोई जाति नहीं है।’ इसके बाद एक नेता आते हैं और आतंकवादी से गुप्तगू करते हैं। दूसरी ओर वे दर्शकों को बताते हैं कि मैं उसे समाज की मुख्य धारा में लाने की कोशिश में लगा हूं। वहीं आतंकवादी उनकी पोल खोलते हुए कहता है कि हम एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं। ये हमें मुख्य धारा नहीं बल्कि फलां जगह पर बम फेंककर आतंक मचाने को कह रहे थे। इसके साथ ही पूरा हॉल तालियों में गूंजता रहा जब-जब नेता,पुलिस व आतंकवादी साथ-साथ होते और आतंकवादी उनकी पोल खोलता। आतंकवादी की भूमिका में डा.मनन, रिटायर्ड फौजी अभय,एसपी व सूत्रधार-विद्याशंकर,फौजी की पत्नी बनी गीता अभय,नेता -शमीम अहमद,दारोगा की भूमिका में धर्मेन्द्र ने अपनी भूमिका में सहज लगे।ं

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