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क्षमा के फूल बारसाइए

धोखा खाया है। आ मैं क्या करूं? क्या बदला लूं या छोड़ दूं? ऐसे विचार हर इंसान के जहन में बार-बार उठते हैं। मामला कुछ भी रहे, लेकिन माफ करना खासा मुश्किल होता है। पर क्षमा करना उतना मुश्किल भी नहीं, जितना लगता है। लोग सोचते हैं कि कसूरवार को माफ करने का मतला है कसूर कबूल करना। क्षमा इंसान को उस व्यवहार पर ध्यान केन्द्रित करने का दााव बढ़ाती है, जिससे उसे भयानक पीड़ा और दर्द झेलना पड़ा। यानी उस इंसान का ऐसे ख्याल करना मानो कि कसूर हुआ ही नहीं। ऐसा ोहद मुश्किल है, बावजूद इसके क्षमा करना राहत देने वाला अनुभव है। याद रखिए कि अगर किसी से आप झगड़ रहे हैं, तो आपके भीतर भी अशांति रहेगी। क्षमा कीजिए और भूल जाइए ही सदा आगे बढ़ने का मंत्र है। एक राजे खलीफा हारून अल रशीद राज दरबार में मंत्रिगण के साथ राजसी विचार-विमर्श में लीन था। एकाएक शहजादा दौड़ता-दौड़ता आया और गुस्से भरे स्वर से बोला, ‘अब्बा हजूर, हमारे फौजी के लड़के ने मुझे बेहद भद्दी गाली दी है।’ तमाम मंत्री भी शहजादे की बात सुनकर तिलमिला उठे। खलीफा ने अपने मंत्रियों से सलाह चाही। एक मंत्री तपाक से बोला, ‘बदतमीज छोकरे की जुबान काट देनी चाहिए, ताकि फिर वह कभी किसी को गाली न दे सके।’ दूसरी सलाह थी, ‘फौजी को बुला कर उसकी औलाद की शिकायत करनी चाहिए। इससे उसकी फिर से ऐसी भद्दी शरारत करने की हिम्मत नहीं होगी।’ सभी मंत्रियों ने गाली के बदले कोई न कोई सजा ही सुझाई। खलीफा सुनता रहा। फिर गम्भीर होकरोोला, ‘शहजादे, जो बड़े होते हैं, उन्हें उदार दिल रखना चाहिए। किसी को फांसी चढ़ाना समझदारी कहां है? उसे तो तहेदिल से क्षमा करने में ही असली बहादुरी है।’ आगे कहा, ‘अगर तुम्हारा इस कदर बड़ा दिल न हो, तो तुम भी उसे गालियां दे आओ। हिसाा बराबर हो जाएगा।’ राजा की बात सुनकर समझदार मंत्री भी शर्मिदा हुए। जाहिर है कि जा हम क्षमावान नहीं बनते, ता हम भी अंदर ही अंदर घुटते हैं। घुटन से तनाव होता है और तनाव तमाम बीमारियों की जड़ है। इसीलिए बेहतर है कि नकारात्मक सोच को बाहर निकालें। किसी को कह कर तो देखिए, ‘आओ, हम पुरानी गलतियां भूल जाते हैं और एक-दूसरे को माफ कर देते हैं।’ सुनकर सामने वाले की आंखों में पानी तैरने लगेगा। देखते ही देखते आंसू इलाज बन जाएंगे। बेशक क्षमा करना रातोंरात मुमकिन नहीं है। लेकिन तय है कि आप ही सबसे ज्यादा भुगतते हैं, जा नकारात्मक सोच में बंधते हैं। क्षमा न करना गुस्से का संचार करता है। स्टीफन कोवे लिखते हैं, ‘क्षमा करने के साथ-साथ आप विश्वास और बिना शर्त प्रेम के द्वार खोलते हैं। क्षमा बदले की भावना का सफाया करती है। क्षमा चमेली के फूल की भांति है। चमेली की बेल उन हाथों पर भी फूल ही बरसाती है, जो उसके तले पर कुल्हाड़ी चलाते हैं। इसी प्रकार, आप भी उन पर क्षमा के फूल बरसाइए, जो आपके प्रति दुर्भावना से कार्य करते हैं।ं

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