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मंत्रिमंडल में फेरबदल का हासिल जमा

बहुत दिनों से जिन अफवाहों का बाजार गर्म था आखिरकार वे सुर्खियों में तबदील हो चुकी हैं। प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल कर दिया है। इस बार यह नहीं लग रहा कि परिवर्तन सिर्फ नाम मात्र के लिए किया जा रहा है या यह दिखलाने को कि आखिर कुछ हो रहा है। सरकार चुप नहीं बैठी है, उभरती चुनौतियों से जूझने के लिए कमर कसे तैयार खड़ी है वगैरह। सबसे पहले यह बात समझना जरूरी है कि सरकार में फेरबदल की जरूरत ही क्यों उठ खड़ी हुई। कुछ मंत्रियों को प्रदेशों में पार्टी का अध्यक्ष बना संगठन में सुधार की जिम्मेदारी सौंपी गई है और इसी कारण एक पद, एक व्यक्ित वाले सिद्धांत का अनुसरण करते हुए कुछ सहयोगियों को उनके मंत्रिपद से मुक्त करने की जरूरत महसूस की गई, ऐसा सोचा जा सकता है। साफ है कि इस सिलसिले में एक ही पैमाने का इस्तेमाल नहीं किया गया है। दोहरे मानदंड साफ नजर आ रहे हैं। सुरेश पचौरी को तो सरकार से अलग कर दिया गया, पर प्रियरंजन दास मुंशी कैबिनेट स्तर पर बरकरार हैं। पश्चिम बंगाल में तीन दशक से भी अधिक समय से कांग्रेस बनवास झेल रही है और वहां संगठन में नई जान फूंकने की चुनौती मध्य प्रदेश से कहीं अधिक विकट है। यह भी न भूलें कि आज भले ही माक्र्सवादी पार्टी मनमोहन सरकार को बाहर से समर्थन दे रही है और भले ही उसी की बैसाखी पर टिकी है, इस रिश्ते में खासी खटास अब तक घुल चुकी है। निजीकरण का मसला हो अथवा अमेरिका के साथ सामरिक रिश्तेदारी जबर्दस्त टकराव बारबार सामने आ चुका है। इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस वाला काँटा भी गले से बाहर अभी तक निकला नहीं है। हमारी समझ में यह बात नहीं आ सकती कि सिर्फ संसदीय मंत्रालय के कार्यभार से मुक्त कर दिए जाने से प्रिय बाबू दोहरी जिम्मेदारी कैसे बेख्ोटके निभा पाएंगे। दूसरी जिस बात ने हमारे मन में विकट आशंकाओं को पैदा किया है, वह पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त श्री गिल के मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने से जुड़ी है। किसी भी जनतंत्र में निष्पक्ष और निर्भय चुनाव आयोग सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था का अंग समझा जाना चाहिए। इस संगठन के पदाधिकारी यदि राजनैतिक महत्वाकांक्षाए पालने लगें तो फिर उनकी निष्पक्षता दलगत पक्षधरता द्वारा कभी भी धराशाई हो सकती है। गिल साहब का केन्द्रीय मंत्री के रूप में शपथ लेना खासा अटपटा है और चिंता का विषय भी। जब उन्होंने राज्यसभा का चुनाव लड़ा था, तभी से जनतंत्र के प्रति निष्ठावान नागरिकों का सरदर्द शुरू हो गया था। इस तरह ‘पुरस्कृत व्यक्ित’ आखिर कितनी देर तक अपने हितैषियों को ‘उपकृत’ करने से बचा रह सकता है? इस तरह की चिंता राजनैतिक रूप से महत्वाकांक्षी दलगत पक्षधरता में फंसे सक्रिय राज्यपालों के बारे में एक से अधिक बार मुखर की जाती रही है। इस तरह के प्रलोभनों से उच्चतर न्यायपालिका के सदस्य भी बचे नहीं रह सके हैं। सर्वोच्च न्यायालय की पीठ पर विराजने वाले कुछ न्यायमूर्ति अवकाश ग्रहण करने के बाद राज्यपाल के सिंहासन पर बैठना सुखकर समझते हैं। हमारा मानना है कि संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों की तरह ऐसी ही बंदिश चुनाव आयोग में कार्य करने वाले महानुभावों के ऊपर भी संवैधानिक रूप से लगाई जानी चाहिए और इसका कड़ाई से पालन भी किया जाना चाहिए। गिल साहब को जो मंत्रालय सौंपा गया है, उसको लेकर भी चुप नहीं बैठा जा सकता इस घड़ी। खेल और युवा मामलों का मंत्रालय आमतौर पर कम महत्व का समझा जाता है और कुछ ही साल पहले तक मानव संसाधन मंत्रालय का एक उपेक्षित विभाग जैसी हस्ती इसकी थी। सन् 2010 में जिन राष्ट्रकुल खेलों का आयोजन राजधानी में होना है, उनके लिए कई हजार करोड़ रुपए के वारे-न्यारे होने वाले हैं। भारत की आन शान को बरकरार रखने के लिए सभी काम तुरत-फुरत निपटाए जाएंगे और अभी से यह आसार साफ नार आने लगे हैं कि युद्ध स्तर पर इस अभियान के संचालन की लाभ लागत का खाता विधिवत रखने की उम्मीद कोई नहीं रखता। फ्लाई ओवरों का निर्माण हो या यमुना तट-तल की तबाही कोई भी सवाल उठाने वाला देशद्रोही करार दिया जा सकता है। भारतीय ओलम्पिक संगठन के अध्यक्ष विवादास्पद सुरेश कालमाडी हों या अन्य खेल संगठनों से जुड़े केन्द्रीय मंत्री और विपक्षी राजनेता इन सभी का टकराव आम आदमी की रोजमर्रा की जिन्दगी के बुनियादी सरोकारों के सवाल उठाने वाले अब तक खेल मंत्री रहे मणिशंकर अय्यर के साथ लगातार होते रहे हैं। मणिशंकर अय्यर का यह दूसरा ‘तबादला’ है। पिछली बार जब मंत्रिमंडल में फेरबदल हुआ था, तब उनसे पेट्रोलियम मंत्रालय वापस ले लिया गया था। विदेश सेवा के अनुभवी अफसर मणिशंकर इस जिम्मेदारी को बखूबी निभा रहे थे, पर जनहित और राष्ट्रहित में उनकी कार्यकुशलता न्यस्त स्वार्थों को और तेल ऊर्जा क्षेत्र में सक्रिय न्यस्त स्वार्थों को रास नहीं आ रही थी। वैसे भी मणि वामपंथी रुझान वाले हैं और इस बदले दौर में वर्ल्ड बैंक के सांचे में ढले अपने सहयोगियों के साथ कदमताल मिला कर चलने में हिचकिचाते रहे हैं। इन सब बातों के बारे में गंभीरता से तत्काल सोचना जरूरी है। गनीमत यह है कि इस फेरबदल में शिबू सोरेन की वापसी नहीं हुई है और दिल्ली की उत्सव समारोह प्रेमी बिरादरी के लाडले खर्चनशीन मेजबान सुबी रामा रेड्डी को रुखसत कर दिया गया है। कुछ और मंत्रियों के इस्तीफे स्वीकार किए गए हैं, जिससे यह दिखाने की कोशिश की गई है कि प्रधानमंत्री अक्षम लोगों को अपने साथ रखने को तैयार नहीं, उत्साही और मुंहफट जयराम रमेश को अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई है, पर उनके बारे में टिप्पणी बेकार है। वह नम्बर 10 जनपथ के करीबी हैं और उनकी योग्यता और कार्यकौशल तथा पारदार्शिता के बारे में दो राय नहीं। बची रहती है बात नए चेहरों की। इनमें निश्चय ही सबसे आकर्षक और आशाप्रद ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं, जिन्होंने संसद में अपने पहले भाषण से ही श्रोताओं और दर्शकों के मन में अमिट छाप छोड़ी है। इसके साथ ही उल्लेख किया जाना चाहिए कि युवराज राहुल की त्याग तपस्या भावना का। पर यह सब बातें अगली बार फिलहाल आशंकाएं ही आशाओं पर हावी हैं। लेखक जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्राध्यापक और अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संकाय के अध्यक्ष हैं।

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