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महंगाई पीड़ित लेखक का खत

सम्पादक महोदय,ड्ढr पिछले दिनों महंगाई पर आपके यहां काफी कुछ पढ़ा। कितने ही सम्पादकीयों में आपने इसका जिक्र किया। लोगों को बताया कि किस तरह सरिया, सब्जी, सरसों का तेल सब महंगे हुए हैं और महंगाई से आम आदमी कितना परेशान है। ये सब छाप कर आपने जो हिम्मत दिखाई है उसके लिए साधुवाद। हिम्मत इसलिए कि ये सब कह आपने अनजाने में ही सही अपने स्तम्भकारों के सामने ये कबूल तो लिया कि महंगाई बढ़ी है। दो हजार पांच में महंगाई दर दो फीसदी थी, तब आप मुझे एक लेख के चार सौ रुपए दिया करते थे, यही दर अब सात फीसदी हो गई है लेकिन अब भी मैं चार सौ पर अटका हूं। आप ये तो मानते हैं कि भारत में महंगाई बढ़ी है, मगर ये क्यों नहीं मानते कि मैं भारत में ही रहता हूं? आपको क्या लगता है कि मैं थिम्पू में रहता हूं और वहीं से रचनाएं फैक्स करता हूं? बौद्ध भिक्षुओं के साथ सुबह-शाम योग करता हूं? फल खाता हूं, पहाड़ों का पानी पीता हूं और रात को ‘अनजाने में हुई भूल’ के लिए ईश्वर से माफी मांग कर सो जाता हूं! या फिर आपकी जानकारी में मैं हवा-पानी का ब्रेंड एम्बेसडर हूं। जो यहां-वहां घूम कर लोगों को बताता है कि मेरी तरह आप भी सिर्फ हवा खाकर और पानी पीकर जिंदा रह सकते हैं। महोदय, यकीन मानिए मैंने आध्यात्म के ‘एके-47’ से वक्त-बेवक्त उठने वाली तमाम इच्छाओं को चून-चून कर भून डाला है। फिर भी भूख लगाने की जैविक प्रक्रिया और कपड़े पहनने की दकियानूसी सामाजिक परम्परा के हाथों मजबूर हूं। यह सुनकर सिर शर्म से झुक जाता है कि आलू जैसों के दाम चार रुपए से बढ़कर, बारह रुपए किलो हो गए, मगर मैं वहीं का वहीं हूं। सोचता हूं क्या मैं आलू से भी गया-गुजरा हूं। आप कब तक मुझे सब्जी के साथ मिलने वाला ‘मुफ्त धनिया’ मानते रहेंगे। अब तो धनिया भी सब्जी के साथ मुफ्त मिलना बंद हो गया है नमस्कार। इसके बाद लेखक ने खत सम्पादक को भेज दिया। बड़ी उम्मीद में दो दिन बाद उनकी राय जानने के लिए फोन किया। ‘श्रीमान, आपको मेरी चिट्ठी मिली।’ ‘हां मिली।’ ‘अच्छा तो खत को लेकर क्या राय है आपकी।’ ‘हूं.. बाकी सब तो ठीक है, मगर ‘प्रूफ की गलतियां’ बहुत है, कम से कम भेजने से पहले एक बार पढ़ तो लिया करो!’

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  • Web Title: महंगाई पीड़ित लेखक का खत