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अकेले चलो

यदि तोर डाक शुने केउ ना आसे, तबे एकला चलो र,’ यह गीत, देशभक्ति की राह पर चलने वालों के लिए ‘रवीन्द्र नाथ ठाकुर’ ने लिखा था। आज भी यह हम सब को रोमांचित कर देता है। यह गीत किसी भी संघर्षरत पर लागू होता है। जीवन पथ पर अकेले छूट गए लोगोिंदगी से आािज आ जाते हैं। अपनी इच्छा से एकाकी रहने वाले अपनी राहें गुलाार करते रहते हैं। मजबूरी में भाग्य के लेखे से जो परिवार को गहमागहमी से दूर, अलग छिटक कर रह गए, उनके दुख की सीमा नहीं। उन्हें औरों के जीवन में असंख्य फूल दिखाई पड़ते हैं, पर अपना बाग सूना दिखता है। संभलने के लिए, अपने कदमों को पुख्ता करने के लिए, अपनी परिस्थितियों को स्वीकार करना-पहली सीढ़ी है। अपनी ही दृष्टि में अपने को दयनीय बनाने से कमजोरी बढ़ती है। रोग का रूप ले लेती है। इसलिए बीमारी बनने से पहले ही बचाव करना पड़ता है। जिस स्थिति को बदला नहीं जा सकता, उसे अपने लिए सहा तो बनाया जा सकता है। आत्मगौरव से हीन व्यक्ति को समाज भी किनार कर देता है। सहारा ढूंढ़ने के लिए कभी इसके, तो कभी उसके आगे रोना, सवाल करना इंसान होने को नकारना है। इसलिए अपने वरदानों को एक-एक करके गिना। अच्छे-बुर दिनों के मेल से बनी जिंदगी में निश्चित ही कुछ तो मुस्कुराहटों से चले होंगे। उन्हीं को सम्बल बनाना होगा। कठिन परिस्थितियों का सामना कोई कैसे मनोभाव या मानसिकता से करता है- उसी पर सुख और दुख भोग निर्भर करते हैं। एक लघु कथा के अनुसार अपनी परशान विवाहित बेटी को मां रसोई घर में ले गई। तीन बर्तनों में पानी उबलने रख दिया। एक में गाजार, एक में अंडा और एक में कॉफी पाउडर डाल दिया। कुछ समय बाद देखा-कड़ी गाजर नर्म हो गई थी, तरल अंडा ठोस, और काफी पानी का रंग बदल कर खुशबू छोड़ रही थी। मतलब यह कि विपरीत परिस्थितियों में लोग नर्म या तो कठोर हो जाते हैं या फिर परिस्थितियों को अपने अनुकूल कर लेते हैं। मुसीबतों को झेलकर, अपने लिए रास्ता निकालने वाला मनुष्य कभी टूटता नहीं। अकेलेपन को आनन्दमयी एकांत में बदल लेने वाला जी जाता है। यदि कोई सुख बांटने वाला न हो, दुख में गले लगाकर रोने वाला न मिले तो निश्चित है कि संसार बनाने वाले ने किसी महान उद्देश्य को पूरा करने के लिए ऐसा जीवन दिया है। यही सोच एकाकी जीवन में रंग भरती है। अकेले चलने वाला तेजी से चलता है। इसलिए रवीन्द्र नाथ ठाकुर के साथ कहो : एकला चलो र यदि तेरी पुकार सुन कोई न आए तो भी अकेले चलो र यदि बात न कोई कर यदि सभी मुख फिरा लें और सभी हों भयभीत तो मुक्तप्राण मन की बातअकेले चलो र यदि गहन पंथ चलते समय सभी लौट जाएं तो पथ के कांटे-लौट जाएं अकेले चलो रे।

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