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पुलिस ने शांति सेना से झाड़ा पल्ला, नक्सली ले रहे

झारखंड की सीमा से लगा गुमला जिला उग्रवादग्रस्त तो है ही यहां की भौगोलिक स्थिति भी उग्रवादियों के पक्ष में है। घटना को अंजाम देने के बाद नक्सली आराम से दूसर राज्य में प्रवेश कर जाते हैं। इन्हें रोकना पुलिस के बूते में नहीं। कुछ समय पहले तत्कालीन एसपी पंका दराद ने नक्सलियों के विरुद्ध गांव के कुछ युवाओं को अपने साथ जोड़ा। उन्हें हथियार थमा संगठन का नाम दिया शांति सेना।ड्ढr इसमें वैसे लोग शामिल हुए जो कभी नक्सली थे तो कुछ वैसे लोग भी थे जो नक्सलियों को इस इलाके में पनपने नहीं देना चाहते थे। लिहाजा इस सेना को पुलिस के साथ आम लोगों का भी समर्थन मिला। वर्ष 2003 में एक बैठक हुई थी। जिसमें एसपी पंका दराद खुद शामिल थे। उस समय गुमला के एसडीपीओ सुधीर झा हुआ करते थे। उन्होंने भी पहल की थी। इन अधिकारियों का प्रयास रंग लाया। गुमला में नक्सली गतिविधियों पर कुछ अंकुश लगा। नक्सलियों के कॉरीडोर में सेमरा भंडारटोली ‘ब्रेकर’ के रूप में उभरा है। इसी इलाके के भादो सिंह रहनेवाले थे। लिहाजा शांति सेना के गठन के बाद से ही यह इलाका निशाने पर था।ड्ढr इसके पहले गुमला के एसपी एमवी राव हुआ करते थे। उस समय सबजोनल कमांडर प्रवीण साहू ने पुलिस से दोस्ती की। साथ मिलकर कई छापामारी में गया और सफलताएं अर्जित की। पंका दराद के समय भी वह रहा। पुलिस शांति सेना को हथियार उपलब्ध कराती रही। करीब 40 लोग इसमें शामिल हुए। इनके पास जो हथियार हैं, वे सभी पुलिस ने उपलब्ध कराये थे। कुछ गांव वालों के पास लाइसेंसी हथियार था। नक्सलियों को यह नागवार लगा। और निशाने पर आ गये शांति सेना के सभी लोग। समय-समय पर नक्सलियों ने चेतावनी भी दी।ड्ढr शांति सेना में अचानक उस समय बिखराव की स्थिति उत्पन्न हो गयी जब जेडीएच गुड़िया को गुमला का एसपी बनाकर भेजा गया। अब तक पुलिस के लिए काम कर रहे प्रवीण साहू के यहां भी छापा पड़ा। हथियार मिले। उग्रवादियों के खिलाफ लड़ रहे लोगों का मनोबल टूटा।ड्ढr शांति सेना में बिखराव का सीधा लाभ उग्रवादियों को मिला। नक्सली गुमला में सिर उठाने लगे। नक्सलियों ने शांति सेना के लोगों को चुन-चुन कर मारना शुरू किया। आर्थिक तंगी से गुजर रहे थे शांति सेना के सदस्यगुमला (अमरनाथ)। विगत लंबे समय से नक्सलियों के विरुद्ध कार्रवाई में जुटे शांति सेना के सदस्यों के हथियार और गोलीबारूद के अलावा अपने पारिवारिक दायित्व को निभाने के लिए भी काफी जद्दोहद करना पड़ा। आर्थिक तंगी से गुजर रहे ये लोग जिला व पुलिस प्रशासन से मोहताज बने रहे। लेकिन आपेक्षिक सहयोग न मिल पाने से संगठन दिनोंदिन कमजोर होता चला गया। पुलिस भले ही शुरूआती दिनों में शांति सेना के सहयोग के बदौलत नक्सलियों के खिलाफ संतोषजनक उपलब्धि हासिल की हो, लेकिन समय बीतने के साथ-साथ पुलिस उन्हें भुलना भी शुरू कर दिया। शांति सेना प्रमुख भादो सिंह समेत अन्य सदस्यों ने अपनी जरूरत की चीजों के लिए लोगों से उधार ले रखी थी। अब इनके गुजरने के बाद परिानों का क्या होगा यह सोच कर परिवार वाले और सहम जाते हैं।ड्ढr भादो सिंह का बेटा पितांबर, तेज प्रताप सिंह व विजय सिंह इस स्थिति में नहीं है कि अपनी बहन लक्ष्मी व प्रतिभा को जरूरत की चीजें उपलब्ध करा सके। ललका के मरने के बाद घायल रणु और उसके बच्चे की देखभाल कौन करगा । नक्सली कार्रवाई में नकुल सिंह व उसकी पत्नी फूलमनी देवी, रंथू व उसकी पत्नी जानकी मार गये। नकुल का बेटा दिलमोहन सिंह, राजकुमार व ललिता कुमारी एवं रंथू का बेटा विष्णु मांझी व महेश मांझी के सामने समस्या मुंह बायें खड़ी है। ड्ढr मुरईटोली के घनश्याम सिंह के बेटे निरांन पर परिवार की गाड़ी खिंचने का दायित्व है। इलाके में चार दिन से डेरा डाले थे नक्सली गुमला (हिब्यू)। गुमला में पालकोट ऐसे ही सबसे अधिक नक्सलग्रस्त माना जाता है। पालकोट थाना क्षेत्र में ही गुड़मा एक गांव है। इसी गांव के रहनेवाले थे भादो सिंह। यह गांव नक्सलियों के निशाने पर था। इसकी जानकारी पुलिस को भी थी। इक्के-दुक्के पुलिसवाले उस इलाके में जाया करते थे। लेकिन पुलिस को भरोसा था गांव वालों का कि यहां तो शांति सेना के लोग रहते है। इस इलाके में कुछ नहीं होगा। आठ अप्रैल की घटना के बाद उस इलाके के लोगों का पुलिस पर से विश्वास उठ गया है। सुबह के दस बजे एक काले रंग का बोलेरो (ोएच 07बी- 6244) पर भादो सिंह, भतीजा ललका सिंह (चालक), मामा नकुल सिंह, उनकी पत्नी फूलमनी देवी, गांव के रंथू मांझी उनकी पत्नी जानकी देवी, ललका सिंह की पत्नी रणु देवी और उनका पुत्र केशरी सिंह तथा कुल्लूकेरा मुरईटोली के घनश्याम सिंह गुमला के लिए चले। सबके अपने-अपने अलग-अलग काम थे। भादो सिंह के यहां कोई पारिवारिक कार्यक्रम होना था। वे इसके लिए रिश्तेदारों के बीच निमंत्रण पत्र बांट रहे थे। सुबह में ही वे बसिया के कोनबीर से लौटे थे। घर से तुरंत तैयार हो गुमला के लिए निकल पड़े। बोलेरो पर सवार लोगों को यह कहीं से उम्मीद नहीं था कि इसमें से एक को छोड़ बाकी लोग कभी वापस नहीं लौटेंगे। गांव से ही एक मोटरसाइकिल पर दो लोग आगे-आगे निकले। .और बच गयीं रणु देवीड्ढr गुमला (हिसं)। माओवादियों के हमले में ललका सिंह (अब मृतक) की पत्नी रणु देवी अपने चार वर्षीय पुत्र केशरी के साथ बच निकली। माओवादियों के हमले में वह घायल हो गयी है। वह सदमे में है। उसे उपचार के लिए सदर अस्पताल गुमला में भर्ती कराया गया है। उसकी स्थिति सामान्य है। रंका में पुलिस और उग्रवादियों कीगढ़वा (हिका)। पुलिस ने रंका के भदुआ घाटी में बीती रात नक्सलियों से भीषण भुठभेड़ कर एके 56 राइफल, पांच किलो का केन बम, 13 जिंदा कारतूस बरामद किये हैं। उग्रवादियों द्वारा उपयोग की गयी एक सवारी गाड़ी, जीप एवं मोटरसाइकिल भी जब्त की गयी है। डीआईजी नंदू प्रसाद ने बताया कि एसपी साकेत सिंह को सूचना मिली कि उग्रवादी हुरदाग से सिरोई कलां जाने वाले हैं। इसी के आधार पर सीआरपीएफ एवं पुलिस ने घाटी में एम्बुस कर रखा था। रात 1.30 बजे तीन वाहन हुरदाग की ओर से आकर रंका भंडरिया पक्की सड़क को पार करते हुए सिरोई कलां कच्ची सड़क में प्रवेश कर गयी। पुलिस द्वारा उक्त वाहन पर टार्च जलाते ही वाहन में भगदड़ मच गयी और उधर से गोली चलने लगी। पुलिस ने जवाबी फायरिंग की। लगभग आधा घंटे तक चली भीषण मुठभेड़ में दोनों ओर से लगभग दो-दो सौ राउंड गोलियां चलीं। नक्सली अंधेरी रात का लाभ उठाते हुए भाग गये।ड्ढr

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