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और पढ़ने लगे भैंस चराने वाले

ोई बच्चा भैंस चराता था, कोई बकरी। कोई होटल में कप प्लेट धोता था, कोई पांलिथिन बीनता था। लेकिन अब ये मासूम क से कबूतर, ख से खरगोश सीखने के बाद पूरी किताब पढ़ने लगे हैं। किसी को दस तक पहाड़ा आता है तो किसी को बीस तक। कुछ को तो पाठ के पाठ कंठस्थ हो गए हैं। नरैनी बीआरसी भवन के शिक्षक रैन बसेरा में चलाये जा रहे बच्चों के ब्रिज कोर्स की यह खूबसूरत और प्रेरणादायक तस्वीर है। विभिन्न गाँवों के इन बच्चों की संख्या 60 है। सब साथ-साथ खाते, खेलते हैं और पढ़ते हैं। बीआरसी प्रभारी राममूर्ति, सहसमन्वयक केपी सिंह, अनुदेशक विनोद अवस्थी और शैलेंद्र सिंह का स्नेह इन मासूमों को मिल रहा है। मकसद है इनको शिक्षा की मुख्यधारा में लाना और अच्छा नागरिक बनाना। जमवारा गाँव का कमलेश (12) भैंस चराता था। कहता है कि स्कूल जाने का मन तो होता था पर भैंस चराए बिना रोटी न मिलती। उसने अपना दर्द गाँव के मास्टर साहब से बताया। उन्होंने उसे यहाँ भर्ती करा दिया। कमलेश को बड़ा अच्छा लगता है : अच्छा-अच्छा खाने को मिलता है। अच्छे कपड़े और मास्टरसाहब खूब पढ़ाते हैं। गोरपुरवा का बरकत (12), नरैनी का रवि (10), नौगवां के रामरतन आदि के भी ऐसे ही हाल थे। रामरतन भी गाय-भैंस चराता था। बीआरसी प्रभारी राममूर्ति ने ऐसे बच्चों का पता लगवाया और सबको ब्रिज कोर्स में भर्ती कर लिया। बीआरसी के सहसमन्वयक केपी सिंह ने बताया कि शुरू में यह बच्चे सहमे रहते थे। ककहरा भी नहीं जानते थे। अनुदेशक विनोद अवस्थी और शैलेंद्र सिंह ने अथक परिश्रम करके पढ़ना-लिखना सिखा दिया। रवि, कमलेश, संजय, रामप्रताप, सुशील आदि ने बताया कि नाश्ते में कभी सूजी का हलवा, कभी गाजर का हलवा मिलता है। दोपहर और रात में दाल सब्जी, रोटी पूड़ी आदि खाने को दिया जाता है। तमाम खुशी के बाद भी ये बच्चे चिंतित भी हैं कि ब्रिज कोर्स समाप्त होने के बाद वे क्या करंगे।

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