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सम्मान और वेतन

छठे वेतन आयोग की सिफारिशों का सशस्त्र बलों के मनोबल पर कैसा असर पड़ा है, इसका अंदाजा जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद द्वारा केन्द्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल को लिखे पत्र से लगाया जा सकता है। पत्र में साफ-साफ कहा गया है कि राज्य में आतंकवाद के विरुद्ध चल रहे अभियान पर वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने से दुष्प्रभाव पड़ेगा। सशस्त्र बलों में सेना के अलावा अर्धसैनिक व पुलिस संगठन शामिल हैं और ये सभी श्रीकृष्ण आयोग की सिफारिशों से खफा हैं। इन संगठनों का मानना है कि ताजा वेतन आयोग की सिफारिशों में प्रशासनिक अधिकारियों को छोड़कशेष सब के साथ अन्याय हुआ है, इसलिए उन्हें रद्द कर दिया जाना चाहिए। आठ प्रतिशत वार्षिक की गति से फल-फूल रही अर्थव्यवस्था में बरसों पहले निजी क्षेत्र के वेतनमान सरकारी वेतनमानों को पीछे छोड़ चुके थे। काम की विकट परिस्थिति और कमजोर पदोन्नति प्रणाली से जूझ रही सेना को छठे वेतन आयोग से जो उम्मीदें थीं, सिफारिश देखकर उन पर पानी फिर गया है। सैन्य कर्मियों को एहसास हो गया है कि निजी क्षेत्र के बराबर वेतन पाना तो सपना था, अब अन्य सरकारी कर्मचारियों से बराबरी करना भी उनके लिए कठिन है। सेना पेट के बल रंगती है और भूखे व असंतुष्ट सिपाहियों से सीमा की रक्षा की अपेक्षा नहीं की जा सकती। कड़वा सच यह है कि हाारों अधिकारियों की कमी से जूझ रही सेना को नई भर्ती के लिए योग्य उम्मीदवार नहीं मिल रहे। सेना के ताजा प्रशिक्षण बैचों में निर्धारित से काफी कम उम्मीदवार हैं। सरकार को तुरंत इस ओर ध्यान देना चाहिए और सेना के वेतनमान, पदोन्नति व सेवा शर्तो को बेहतर बनाना चाहिए। कश्मीर और उत्तर पूर्व के कई राज्य आतंकवाद की आग में जल रहे हैं। देश की सुरक्षा के लिए सैन्य बलों का मनोबल बनाए रखना जरूरी है। केवल संतुष्ट बाबुओं के भरोसे देश नहीं चल सकता शेष सेवाओं की संतुष्टि भी उतनी ही जरूरी है। खतर की घंटी बज रही है, देरी करने से स्थिति बेकाबू हो सकती है।ं

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