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इस्लामी शरीयत की कसौटी पर नया निकाहनामा कितना सही?

ुरआन व सुन्नत के मुताबिक है निकाहनामा शाइस्ता अंबर, अध्यक्ष, आल इंडिया मुस्लिम वुमेन पसर्नल लॉ बोर्ड महिला पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा जारी निकाहनामे में मियां बीवी के लिए जो हिदायतें हैं वह पूरी तरह कुरआन व सुन्नत के मुताबिक हैं। इसमें महिला हकों का संरक्षण है, जो शरीयत के मुताबिक है। शौहर की ज्यादती, एड्स जसी बीमारी छुपाने या खाना कपड़ा न देने की बुनियाद पर औरत तलाक के लिए पहल कर ‘खुला’ ले सकती है, लेकिन पुरुष प्रधान समाज में इसका इस्तेमाल नहीं किया जाता है। एक समय में तीन बार तलाक बोलकर तलाक देना गैरइस्लामी है। मियां-बीवी को अपने मामलात को सुलझाने के लिए कम से कम तीन महीने का समय मिलना चाहिए। कुरआन में स्पष्ट है कि मियां-बीवी के बीच मनमुटाव दूर करने और सुलझाने के लिए दोनों तरफ से एक हकम (फैसला करने वाला) बनाया जाए, ताकि वह उनके बीच फैसला कर, अगर इसके बाद भी मियां-बीवी में बात न बने तो वे तलाक द्वारा अलग हो जाएं। पूर्व सुलह-सफाई के बिना अदालतें भी अब तलाक नहीं मान रही। निकाहनामे में एसएमएस, ई-मेल और वीडियो कान्फ्रेंसिंग द्वारा दी गई तलाक वैध नहीं है। यह अजीब है कि उलेमा परिवार तोड़ने के लिए इन उपकरणों का इस्तेमाल सही मानते हैं। गुस्से की तलाक को भी निरस्त किया गया है। गुस्से की हालत में आदमी सही फैसला नहीं कर पाता है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एमएम अहमदी ने भी अपने फैसले में गुस्से और एसएमए द्वारा दी गई तलाक को मानने से इनकार कर दिया था। इस निकाहनामे की जरूरत इसलिए थी कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के मॉडल निकाहनामे में महिला अधिकारों का संरक्षण नहीं किया गया है। पूर्व में बोर्ड के महासचिव मौलाना मिन्नतउल्ला रहमानी और अध्यक्ष काजी मुजाहिदुल इस्लाम काामी आदि ने जो ‘इकरारनामा’ तैयार किया था, उसमें औरतों के अधिकारों की बात कही गई है, जिसे बोर्ड ने छुपा लिया है। ड्ढr शरीयत और शरई के खिलाफ है यह कवायद मुफ्ती अरशद फारूकी सचिव, मर्काी जमीअत उलेमा महिला पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा जारी निकाहनामे में तलाक को लेकर जो बातें हैं वह शरई लिहाज से सही नहीं है, शरीयत के खिलाफ हैं। निकाहनामे में एसएमएस और ई-मेल से दी गई तलाक को वैध नहीं माना गया। तलाक दो तरह से दी जाती है। एक जुबानी और दूसरा तहरीरी। वर्तमान में एसएमएस और ई-मेल एक तरह की तहरीर है और अगर ोजने वाला इस बात को स्वीकारता है कि यह उसी ने ोजा है तो तलाक हो जाएगी। गुस्से की हालत में भी तलाक को अवैध मानने की बात कही गई है। अभी तक हनफी मसलक एवं अन्य मसलक के न्याय विधियों का मानना है कि गुस्से की हालत में दी गई तलाक हो जाएगी। वैसे भी तलाक हंसी-खुशी में नहीं, गुस्से में ही दी जाती है। न्याय विधियों के अनुसार आदमी का गुस्सा इस स्तर पर पहुंच जाए जहां बीवी और बहन में फर्क न कर सके, वहां उस आदमी द्वारा दी गई तलाक वैध नहीं है। तलाक का मामला बिल्कुल बंदूक की गोली की तरह है। बदूंक की गोली चलने से जिस तरह आदमी मर जाता है उसी तरह तलाक देने से हो जाती है। निकाहनामे में कहा गया है कि तलाक का हक औरत को हासिल है। यह बात सही नहीं है क्योंकि इस्लाम में परोक्षरूप से औरत को तलाक का हक हासिल नहीं है बल्कि खुला की सूरत में उसे यह हक है। खुला में कोई बीवी शौहर से छुटकारा चाहती है, तो वह अपने शौहर को इस बात के लिए राजी कर ले कि वह अपना माल देकर उससे छुटकारा हासिल कर। यह प्रक्रिया पूरी करने के लिए उसका काजी के पास जाना जरूरी है। दूसरा निकाह के समय ही शर्त लगा दी जाए कि यदि शौहर परशान कर तो उसे तलाक पाने का हक होगा। शौहर-बीवी में मन-मुटाव दूर करने और तलाक देने के लिए तीन महीने का समय देने की बात कुरआन के बताए गए दिशा-निर्देशों के विपरीत है। महिला बोर्ड को हक नहीं कि वह कोई निकाहनामा जारी कर क्योंकि उसमें शरीयत का ज्ञान रखने वाली महिलाएं नहीं हैं।

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  • Web Title: इस्लामी शरीयत की कसौटी पर नया निकाहनामा कितना सही?