DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

अधिकार की खींचतान

इंडियन प्रीमियर लीग के मीडिया कवरा की शर्तो को लेकर बीसीसीआई और मीडिया के बीच का विवाद ऐसा लगता है कि बीसीसीआई के कुछ लोगों के अतिउत्साह से पैदा हुआ है। आईपीएल में अचानक अरबों रुपए की जो बरसात हो गई है, उससे खुश होकर वे इस आयोजन से आखिरी पैसा तक निचोड़ लेना चाहते हैं। आईपीएल को लेकर सारी चर्चा भी इससे जुड़े अनाप-शनाप पैसे को लेकर ही हुई है, लेकिन याद रखने की बात है कि न खेल, न मीडिया मूलत: व्यापार है। ये दोनों समाज की जरूरी गतिविधियां हैं और व्यापार इससे जुड़ा हुआ आनुषंगिक पक्ष है। इन दिनों क्रिकेट में भी ढेर सारा पैसा आया है और मीडिया में भी, इसलिए इस आनुषंगिक पक्ष को ही बुनियाद मानने की प्रवृत्ति बढ़ गई है। चूंकि ऐसा मानना खेल या मीडिया की मूल भावना और विश्वसनीयता को नष्ट करता है, इसलिए अंतत: वह सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को काटने वाली बात ही होगी। अगर बीसीसीआई मीडिया को अपने आयोजनों की खबर या फोटो छापने की सुविधा देता है तो वह कोई एहसान नहीं करता। यह मीडिया के सूचना देने के काम में मदद करता है और प्रकारांतर से इससे उसे भी फायदा मिलता है। यह परस्पर सहयोग और सहाीविता का संबंध है। अगर अतिलोकप्रिय अंतराष्ट्रीय एक दिवसीय खेलों के कवरा से मीडिया को ज्यादा फायदा मिलता होगा, तो कम लोकप्रिय रणजी ट्राफी की नियमित कवरा से बीसीसीआई या क्रिकेट का ज्यादा फायदा है। संभव है कि तर्कवादी या कानूनी दृष्टि से देखने पर कुछ चीजों को ठीक साबित किया जा सके, लेकिन एक व्यापक दृष्टिफलक में कहीं कहीं थोड़ा उदार होना ज्यादा फायदेमंद है। यहाँ यह भी कहना जरूरी है कि मीडिया को भी विशुद्ध व्यापार या ज्यादा से ज्यादा फायदा कमाने का जरिया बनाना खतरनाक है, क्योंकि तब आप जनसंचार या सूचना के माध्यम की रियायतें पाने का नैतिक अधिकार खो देते हैं। आखिर कब तक गुड़ खाने वाले गुलगुलों से परहेा कर सकते हैं?ं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: अधिकार की खींचतान