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कई बाधाओं से जूझना है विज्ञान को

वैज्ञानिक संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए देश में जितनी चर्चाएं होती रहीं, उसके मुकाबले उतने प्रयास नहीं हुए। विज्ञान को नीरस विषय मानकर इस पर किए जाने वाले खर्च को गैर जरूरी ही माना जाता रहा। शिकायतें उभरती रहीं कि देश में अच्छे वैज्ञानिकों का अभाव है। वैज्ञानिक मांग करते रहे कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनुसंधान तथा परियोजनाओं का निर्माण विषय विशेषज्ञों द्वारा हो। शिकायत थी कि प्रशासकों की लेट लतीफी के चलते अनुसंधान तथा परियोजना प्रस्तावों का टलते रहना एक बड़ी समस्या है। कोई प्रस्ताव दो-तीन साल बाद जब पारित हो जाता है, तब उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता। तब तक विज्ञान और प्रौद्योगिकी की दुनिया कहीं से कहीं पहुंच चुकी होती।ड्ढr विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्राथमिकताएं तय करने, अच्छे वैज्ञानिक छांटने, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी से संबंधित संस्थानों के मुखिया का चयन करने जसे सभी निर्णय प्रशासकों द्वारा लिए जाने के देश के वैज्ञानिकों में निश्चय ही काफी हताशा बढ़ी है। उनमें ये विचार घर कर गया कि युवा वैज्ञानिक तैयार करने के लिए आवश्यक माहौल का संस्थानों में प्रभाव है। वैज्ञानिकों की ये आम है कि उनके क्षेत्र की जरूरतों का सही महत्व प्रशासक नहीं आंक सकते। प्रशासक एक ही जवाब देते हैं कि वैज्ञानिक क्या विशिष्ट है? इसके जवाब में वैज्ञानिक कहते हैं कि वे तो कहीं भी जाकर अच्छी नौकरी पा सकते हैं, लेकिन प्रशासक कैसे विशिष्ट हैं? लेकिन एसे आरोप-प्रत्यारोप अब अंतिम दौर में है। एक बिल ‘साइंस एंड इांीनियरिंग रिसर्च बोर्ड’ संसद में है। यह बिल संसद से पारित होते ही कानून का रूप लेगा और एसईआर बोर्ड अस्तित्व में आ जाएगा, जो देश के विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी से संबंधित अनुसंधान तथा परियोजना प्रस्तावों को स्वीकृति प्रदान करगा तथा धन उपलब्ध कराएगा। यह बोर्ड ठीक उसी तरह से प्रभावी होगा जसे दुनिया के अनेक देशों के नेशनल साइंस फाउंडेशन हैं। लगभग 1000 करोड़ रुपए के फंड से बनने वाले इस बोर्ड से आशा होगी कि वह देश को विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक नई दिशा दे। यह जरूरी है कि हमार वैज्ञानिक देश की परिस्थिति समझते हुए अपनी भूमिका तय करं। बोर्ड से ऐसी मूलभूत आवश्यकताओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की अपेक्षा है। मानवता और समता की तरह वैज्ञानिक मनोवृत्ति विकसित करने की ओर हमार संविधान निर्माताओं ने काफी जोर दिया है। वैज्ञानिक मनोवृत्ति से तात्पर्य तार्किक बुद्धि, विश्लेषणात्मक चिंतन, कार्य करने का तरीका, तर्कसंगत व्यवहार से है। ऐसी जरूरतों को ध्यान में रखकर देश में एक स्वतंत्र साइंस फाउंडेशन की मांग अर्से से उठती रही है। प्रधानमंत्री की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के प्रमुख डॉ. सीएनआर राव इस अभियान के मुखिया रहे हैं। एसईआर बोर्ड के अस्तित्व में आने से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संबंधी सभी समस्याओं का हल निकल जाएगा, ऐसा नहीं माना जा सकता। देश में विज्ञान विषयों को लेकर अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों की संख्या में कमी आई है। विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी से संबंधित विषयों के पाठय़क्रमों के स्तर को लगातार उठाने की जरूरत है। वैज्ञानिकों और विज्ञान विषयक शिक्षकों की नियुक्तियों पर लगी पाबंदी हटाने जसी बोर्ड से उम्मीदें हैं। प्रस्तावित एसईआर बोर्ड विशुद्ध अनुसंधान तथा वृहत परियोजनाओं को ही प्राथमिकता देने लगा तो स्पष्ट रूप से वह प्रशासकों सा व्यवहार करगा, जिसकी निंदा वैज्ञानिक करते रहे हैं। विज्ञान के लिए अधिक धन की मांग जाती रही है। यह जायज लगती है। निश्चय ही देश के सामने खड़ी चुनौतियों से दो चार होते बोर्ड को अपने चिंतन, प्रवृत्ति और आचरण से अपने को सिद्ध करने का अवसर मिलेगा। उससे यह अपेक्षा स्वाभाविक रूप से होगी कि वह देश में विज्ञान विषयों के प्रति जनचेतना के सकारात्मक रुझान को विकसित करने में सहायक हो। लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं

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