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बानगंगा सूखी,अब बागेन और केन की बारीअशोक निगम

वषाहिल और बानगंगा सूख गयीं। अब बागेन और केन भी सूखती जा रही हैं। बागेन लगभग खत्म है। केन भी बचने वाली नहीं है। बागेन कहीं नाले जसी दिखती है तो कहीं टूटी नहर सरीखी। यहाँ बहने वाली रां और चंद्रावल जसी छोटी नदियों में सिर्फ गड्ढों में पानी बचा है। पूर साल बहने वाली नदियाँ इस साल दम तोड़ रही हैं। फतेहगंज क्षेत्र के वन से निकली विषाहिल और बानगंगा का दम जनवरी महीने में ही उखड़ने लगा था। अब तो रत उड़ती नजर आ रही है। बूँद भर पानी नहीं। लोग बताते हैं कि विषाहिल तो कभी दगा दे भी जाती थी लेकिन बानगंगा ने कभी साथ न छोड़ा था।ड्ढr कहते हैं कि चित्रकूट प्रवास में भगवान राम ने क्षेत्र को जलसंकट से उबारने के लिए सूखी धरती को बाणों से चीर एक जलधार निकाली थी। बाणों से निकली यही जलधार बानगंगा कहलाई। मध्य प्रदेश के कौहारी और सेहा पहाड़ से निकलने वाली बागेन का अब तो उद्गम स्थल भी सूख गया है। उधर, छतरपुर से निकली केन रनगवाँ, बरियापुर, गंगऊ जसे तीन विशाल बाँधों को अपने उदर में समेटने के बावजूद बाँदा की हमेशा प्यास बुझाती आई है। आज उसी के न के प्राण, उसका अस्तित्व संकट में पड़ गया है। केन में रो स्नान-ध्यान करने वाले लक्ष्मीनारायण गुप्ता, ओंकारनाथ, दिनेश निगम, मदन तिवारी, रामजी गुप्ता व धर्मवीर सिंह ने बताया कि केन की जलधारा एक फुट और पानी की गहराई दो इंच प्रतिदिन सिमटती जा रही है। इस समय राजघाट और नाव घाट में भी जलधारा 25 मीटर के लगभग है। बाकी स्थानों पर तो यह बस पाँच से आठ मीटर के बीच है।ड्ढr

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