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वेतन आयोग - बेमतलब कोशिश की उलझनें

वेतन आयोग की रिपोर्ट ने बहुत उत्साह और उम्मीदें जगाई हैं। सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कंपनियों में काम कर रहे लोगों को भी लगता है कि वेतन आयोग की सिफारिशों से अंतत: उन्हें भी लाभ होगा। फिर भी रिपोर्ट आने के बाद हर कोई खुश नहीं है। जस्टिस श्रीकृष्ण ने वित्तमंत्री से मजाक में कहा था कि उनकी सिफारिशों से हर कोई खुश होगा भी नहीं। पूर्ववर्ती वेतन आयोगों की तरह इस आयोग को भी वेतन ढांचे के साथ-साथ सरकार को एक आदर्श पेशेवर और जनहितैषी चेहरा देने की जिम्मेदारी दी गई थी। जैसी कि उम्मीद थी, आयोग की रिपोर्ट पर विरोधाभासी प्रतिक्रयाएं हुईं। निम्न मुद्दों पर हर कोई एकमत नहीं है।ड्ढr - क्या यह सरकारी नौकरियों को ज्यादा आकर्षक बनाएगी?ड्ढr - क्या सरकारी नौकरियां प्रतिभाशाली लोगों को लुभा सकेंगी?ड्ढr - क्या आयोग की सिफारिशें भ्रष्टाचार को हतोत्साहित करेंगी?ड्ढr - क्या उच्च वेतन देने से जनसंपर्क में सर्वाधिक आने वाले सरकारी कर्मचारियोंे मसलन पुलिस कर्मियों, स्कूली शिक्षकों, जिलाधिकारियों के आचरण में विनम्रता आएगी?ड्ढr - क्या इससे जनता के काम तेजी से हो पाएंगे?ड्ढr - क्या इससे कर्मचारियों की विभिन्न श्रेणियों,ं खासकर पुलिस और सशस्त्र सेनाओं के बीच संतुलन बना रहेगा?ड्ढr - आईएएस अधिकारियों के लिए की गई सिफारिशों से अपनी तुलना कर पुलिस अधिकारी नाखुश हैं। सिविल और सशस्त्र सेनाओं के अंतर से सेना नाराज है? इनमें से हर किसी के असंतोष का अलग से विश्लेषण करना जरूरी है। हम यहां चार मुख्य मुद्दों पर चर्चा करते हैं :ड्ढr पहला है सरकारी नौकरी के प्रति योग्य व्यक्ितयों को लुभाने के लिए एक प्रतिस्पर्धी वातावरण बनाना। वेतन आयोग में नियामकों को उच्च वेतन देने, ठेके पर नियुक्ितयों को प्रोत्साहन देने और पेशेवरों को निर्धारित वेतनमानों से अलग रखने की सकारात्मक सिफारिश की गई है। ऐसी सिफारिशों के कई फायदे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और नियमों का ईमानदारी से पालन करने पर नियुक्ितयों की वर्तमान प्रणाली में सुधार आएगा। लेकिन बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि उन्हें लागू कैसे किया जाता है। चालू रुझान के आधार पर कहा जा सकता है कि भविष्य में भारतीय अर्थव्यवस्था 8 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी और निजी क्षेत्र का वेतन सरकारी नौकरियों से अधिक रहेगा। फिर भी पूरी दुनिया में सरकारी नौकरियों के माध्यम से होने वाले फैसले ही सार्वजनिक जीवन पर असर डालते हैं। सरकारी नौकरियों का यह एक ऐसा सशक्त पहलू है जो उन्हें सदैव महत्वपूर्ण बनाए रखता है। वेतन आयोग को राज्य सरकारों से भी परामर्श करना चाहिए था। चूंकि सिफारिशें केवल केन्द्रीय कर्मचारियों पर लागू होंगी, इस कारण राज्य सरकारों की राय लेना जरूरी नहीं समझा गया। पुराना अनुभव बताता है कि आयोग की सिफारिशों से राज्य सरकारों पर भारी दबाव बनता है और उन्हें भी अपने कर्मचारियों के वेतनमानों में संशोधन करना पड़ता है। पांचवें और छठे वेतन आयोग की सिफारिशें आम चुनाव से पहले सौंपी गईं, इस कारण उन्हें टालना और भी कठिन हो गया। वेतन आयोग के वित्तीय पक्ष के अलावा प्रशासनिक सुधारों के संबंध में की गई सिफारिशों के चलते राज्य सरकारों की राय जानना जरूरी है। स्वास्थ्य, शिक्षा तथा ग्रामीण आधारभूत संरचना जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों के कारण राज्यों की भागीदारी और भी जरूरी हो जाती है। वेतन आयोग ने एक महत्वपूर्ण सिफारिश ‘परफार्मेस रिलेटेड इंसेंटिव स्कीम’ (पीआरआईएस) को लेकर की है। इसमें तदर्थ बोनस के स्थान पर कर्मचारी की कार्यकुशलता को आंककर इंसेंटिव स्कीम लागू करने का विकल्प सुझाया गया है। किसी के काम का जायजा खुले और पारदर्शी तरीके से करने की बात कही गई है। आईआईएम अहमदाबाद ने इस स्कीम का एक माडल भी सुझाया है, लेकिन यह माडल सैद्धांतिक अधिक है। व्यावहारिक बनाने के लिए इसे स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल ढाला जाना जरूरी है। चौथा जरूरी सुझाव वेतनमान के वर्तमान 35 स्केल घटाकर 20 करना है। इससे शीघ्र निर्णय को प्रोत्साहन मिलेगा तथा ठोस परिणाम सामने आएंगे। निर्णय लेने के अधिकार का विकेन्द्रीकरण आवश्यक है। दुख की बात यह है कि कई राज्य सरकारें स्थानीय निकायों व पंचायती राज संस्थाओं को वित्तीय व प्रशासनिक अधिकार सौंपने की संवैधानिक बाध्यता की भी अनदेखी कर रही हैं। फैसलों के अमल के स्तर पर होने वाली देरी से अक्सर जन आक्रोश पैदा हो जाता है, जो चिंता का विषय है। किसी परियोजना को लागू करने में देरी से खर्चा भी बढ़ जाता है किन्तु निर्णय अनेक स्तर पर होने से किसी को देरी के लिए जवाबदेह ठहराना कठिन होता है। पहले आए वेतन आयोगों ने बेहतर वेतन देने के साथ-साथ प्रशासनिक सुधार संबंधी सिफारिशें भी की थी। पांचवें आयोग ने सरकारी कर्मचारियों को अच्छा वेतन देने के अलावा उनकी संख्या में कटौती की बात की थी। वेतन तो बढ़ा दिया गया, किन्तु कर्मचारियों की संख्या में कमी की बात सबने भुला दी। वर्तमान वेतन आयोग ने भी अपनी सभी सिफारिशों को लागू करने की अपेक्षा की है क्योंकि सिफारिशें आंशिक तौर पर स्वीकार करने से अनेक विसंगतियां उत्पन्न हो सकती हैं। इस आयोग ने जो सुझाव दिए हैं उनका प्रशासनिक सुधारों से गहरा रिश्ता है। यदि वेतन वृ िके साथ-साथ अन्य सिफारिशें लागू नहीं की गईं तो आयोग की मेहनत पर पानी फिर जाएगा।ड्ढr लेखक जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे केंद्र सरकार में सचिव और योजना आयोग के सदस्य रह चुके हैं।लेखक जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे केंद्र सरकार में सचिव और योजना आयोग के सदस्य रह चुके हैं। लेखक जाने-माने अर्थशास्त्री हैं, वे केंद्र सरकार में सचिव और योजना आयोग के सदस्य रह चुके हैं।ं

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