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धर्म-राजनीति में गठचाोड़ एक समस्या

धर्म और राजनीति में गठाोड़ के कारण दलित और आदिवासी का उत्पीड़न हो रहा है। यह एक गंभीर समस्या हो गई है। हालत यह है कि चुनावों में राजनीतिक पार्टियों की जगह अब जातियों की सरकारं बन रही हैं। वर्ण व्यवस्था और धर्म ने समाज को जिस तरह बांट दिया है उसके लिए प्रलेस को मुखर संघर्ष करने की जरूरत है।ड्ढr ड्ढr इस यथार्थ को प्रलेस से जुड़े लोगों को अपनी रचनाओं के माध्यम समाज के सामने रखना चाहिए। प्रलेस ने हमेशा आदिवासी, दलित और महिला शोषण के विरुद्ध साहित्य के माध्यम से संघर्ष की प्रतिज्ञा को दोहराया। गोदरगांवा में आयोजित प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के तीन दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन के दूसर दिन गुरुवार को दलित, आदिवासी, स्त्री लेखन और धार्मिक अल्पसंख्यकों की समस्याएं और नव साम्राज्यवाद विषयक संगोष्ठी में प्रलेस से जुड़े रचनाकारों ने उपर्युक्त विचार व्यक्त किया। डा.नामवर सिंह ने विषय प्रवेश कराया जबकि रमेन्द्र (झारखंड) और बद्री नारायण (इलाहाबाद) ने आलेख प्रस्तुत किया। आलेख प्रस्तुत करते हुए वक्ताओं ने कहा कि जातिवाद और वर्ण व्यवस्था की मार सहनेवाले दलित व आदिवासी अब नव साम्राज्यवाद के विकास मॉडल का शिकार हो रहे हैं। उन्होंने दलित व आदिवासी का साहित्य के माध्यम से संघर्ष का ऐतिहासिक आकलन प्रस्तुत किया। संगोष्ठी की अध्यक्षता तमिल लेखक पुन्नीलन, डा.तुलसी राम और डा.अली जावेद ने की। संगोष्ठी को वीरन्द्र यादव (लखनऊ), मूलचन्द सोनकर (वाराणसी), डा.शंभुनाथ (आगरा), अरुण कमल (पटना), अशोक चौधरी (गुजरात), डा.सुबोध मालाकार (ोएनयू), अजय वर्मा (रांची), रामलोचन सिंह (पटना), डा.सुनील कुलकर्णी (नागपुर), महेन्द्र नारायण पंका व सचिन्द्र (मधेपुरा) ने भी संबोधित किया। मंच संचालन रमाकांत श्रीवास्तव (छत्तीसगढ़) ने किया।

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