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रंग न जमा सकी बिसारिया की वापसी

महान नाटककार विलियम शेक्सपियर के नाटकों का मंचन निश्चय ही चुनौती भरा कार्य है लेकिन जब इन चुनौतियों के सामने प्रसिद्ध रंगकर्मी राज बिसारिया हों तो अपेक्षा भी अधिक जगती है लेकिन भारतेन्दु नाट्य अकादमी में लगभग 18 वर्षो बाद उनकी वापसी कराती नाट्य प्रस्तुति ‘मैकबेथ’ ऐसी अपेक्षाओं पर बहुत खरी नहीं उतरती। राज बिसारिया भीड़ में शामिल होने वाले रंगकर्मी नहीं हैं लेकिन उनके निर्देशन में शुक्रवार को रवीन्द्रालय में हुई यह प्रस्तुति प्रयोग या कल्पनाशीलता के स्तर पर भीड़ से अलग नहीं ठहरती। नाटक की सफलता बस इस दृष्टि से है कि वह बच्चन द्वारा किए गए ‘मैकबेथ’ के पद्यानुवाद को मंच पर उतारने का दमखम दिखाती है।ड्ढr शेक्सपियर के तमाम दूसर नाटकों की तरह ‘मैकबेथ’ मनुष्य की महत्वाकांक्षाओं, विश्वासघातों, अच्छाई-बुराई के संघर्षो और अन्तरविरोधों-अन्तरद्वंद्वों से जूझते चरित्रों का नाटक है लेकिन आज के समाज में इनके उपस्थित होने के बावजूद यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि क्या चार सदी पुराने इस नाटक को क्या हुबहू किया जाना चाहिए या उन्हें आज के समाज से जोड़ने के लिए कुछ छूट भी ली जानी चाहिए। याद आती हैं, हाल में आईं ‘मकबूल’ और ‘ओंकारा’ जसी फिल्में जो शेक्सपियर के नाटकों क्रमश: ‘मैकबेथ’ और ‘ऑथेलो’ पर आधारित होते हुए भी हमार अपने समाज से गहराई से जुड़ गई थीं। लेकिन बिसारिया का ‘मैकबेथ’ यदि बोझिल आख्यान बनकर रह जाता है तो इस कारण कि वह हमसे जुड़ नहीं पाता।ड्ढr अकादमी की यह महत्वाकांक्षी प्रस्तुति है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सहयोग से इस नाटक की 13 अप्रैल तक तीन निरन्तर प्रस्तुतियाँ होनी हैं। नाटक में पीर गुलाम की प्रकाश व्यवस्था, अनिला सिंह खोसला की वेशभूषा है लेकिन नाटक में प्रयोग का अभाव खलता है। मंच सज्जा भी साधारण ही रखी गई है। मैकबेथ की मन:स्थिति को तीन मैकबेथ के द्वारा सम्प्रेषित करने का विचार ही थोड़ा नया है।ड्ढr लेकिन नाटक में प्रशंसा के योग्य प्रशिक्षु रंगकर्मियों का अभिनय है जो अपनी सीमाओं के बावजूद प्रभावित करता है। खासकर मैकबेथ और उसके पत्नी के चरित्र को बड़े ही अच्छे ढंग से मंच पर उतारा गया है। नाटक की प्रमुख भूमिकाओं में शाश्वत दीप, निर्मला, गुंजन कुमार, राजकुमार सिंह बिष्ट, सुनील उपाध्याय, मनोज मिश्र, अन्तिम कुमार, शाजली खान, हेमा सिंह, रोहित राज वर्धन, राजकुमार सिंह बिष्ट थे। ड्ढr ं

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