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महंगाई है कि मानती नहीं

फिलहाल तो ऊंचे दाम कम होते नजर नहीं आते। अच्छा होगा कि आप इसके साथ जीना सीख लें। यह बात और कोई नहीं बल्कि सरकार के खुद के आंकड़े कहते हैं। शुक्रवार को जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2मार्च को समाप्त हुए महा पांच सप्ताहों में मुद्रा स्फीति 5 फीसदी से बढ़कर 7.4 फीसदी जा पहुंची। नवंबर 2004 के बाद यह अधिकतम है। चुनाव वर्ष में महंगाई के राजनीतिक खामियाजे से चिंतित सरकार ने कीमतों पर लगाम कसने के लिए अनेक उत्पादों पर शुल्कों में कटौती समेत कई कदम उठाए। लेकिन इसका मामूली असर हुआ क्योंकि महंगाई की आंच दुनियाभर में खाद्य पदार्थो के साथ ही लौह अयस्क की कीमतों में लगी आग से पैदा हुई है। केबिनेट मीटिंग से बाहर आए साइंस एंड टेक्नोलॉजी मिनिस्टर कपिल सिब्बल ने कहा, ‘सरकार के पास कोई जादुई छड़ी नहीं है। हम बढ़ती मुद्रा स्फीति को लेकर बेहद चिंतित हैं।’ थोक मूल्यों पर आधारित शुक्रवार के आंकड़े तो वास्तव में महंगाई की कहानी की महा प्रस्तावना भर हैं। असली कहानी तो फुटकर कीमतें बताती हैं, जो और भी ज्यादा तेज रफ्तार से बढ़ रही हैं। इस अखबार और मार्केट रिसर्च फर्म सी4 द्वारा कराए गए देशव्यापी सव्रे में 8ीसदी ने कहा कि बढ़ती कीमतों ने उनका घरलू बजट चौपट कर दिया है। 60 फीसदी का तो मानना है कि ये हालात सालभर से ज्यादा बने रह सकते हैं। जब मुद्रा स्फीति सिर चढ़ कर बोलती है तो रिार्व बैंक इससे निपटने के लिए ब्याज दर बढ़ा देता है। इसका नतीजा यह निकलता है कि उपभोक्ता की जेब में कम पैसे रह जाते हैं। अगर ऐसा होता है तो आपको खाने-पीने के सामान के लिए ज्यादा पैसा चुकाने के अलावा ईएमआई भी ज्यादा देनी होगी। (बिजनेस पेज भी देखें)ं

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