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काली टोपी वाले लामा को लेकर विवाद

विश्वव्यापी तिब्बती लागों के विरोध क चलते जलती-बुझती आेलम्पिक मशाल बीजिंग पहुंच पाएगी या नहीं, इसमं अभी संदेह बरकरार है। तिस पर करमापा दारजी की अमेरिका यात्रा ने चीन के लिए मुसीबतें बढ़ा दी हैं। बेशक ल्हासा में धर्मगुरु दलाई लामा का वर्चस्व हो, लेकिन करमापा दोरजी का सिक्िकम, भूटान से लेकर पश्चिम में दबदबा है। अब दलाई लामा बूढ़े भी हो रहे हैं और उनका राजनीतिक वारिस भी खोजा जा रहा है। ऐसे में करमापा दोरजी का नाम जोर-शोर से उठा है। करमापा को चीन और दलाई लामा दोनों का समर्थन प्राप्त है। एसे में अमेरिका करमापा दोरजी पर डोरे डाल कर चीन को अस्थिर और अलोकतांत्रिक देश के तौर पर बदनाम करने में हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है। हालांकि वारिस की खोज में राजनीति ज्यादा है क्योंकि दलाई लामा और करमापा दोनों ही तिब्बत के दो अलग-अलग बौद्ध संप्रदायों के अगुवा हैं और एक संप्रदाय किसी दूसर के धर्मगुरु को नहीं मानता, पर दोनों के मौजूदा धर्मगुरुओं में कुछ समानताएं भी हैं। दोनों ही तिब्बत में जन्मे और धर्मगुरु का दर्जा हासिल करने के बाद बचपन में ही हिमालय के कठिन रास्तों से होते हुए भारत आ गए। करमापा दोराी जब भारत आए तो उनकी उम्र महा 13 साल थी, अब वे 21 साल के हैं। अब जब तिब्बत की आजादी की लड़ाई आेलम्पिक मशाल के बहाने फिर जोर पकड़ रही है। कहा यह भी जा रहा है कि इस लड़ाई को पर्द के पीछे से अमेरिका हवा दे रहा है। इसी के चलते चीन ने करमापा दोरजी की अमेरिकी यात्रा का विराध किया है। करमापा दोरजी का भी विवादों से नाता कम नहीं रहा। उनका अपना संप्रदाय उनके इस पद पर विराजने के काफी पहले ही विभाजित हा चुका है। इसीलिए पिछली दो पीढ़ी से दा-दा करमापा धरती पर मौजूद हैं। लेकिन इनमें करमापा दोरजी ही हैं जिनका चीन और दलाई लामा दानों से मान्यता मिली हुई है। कहा जाता है कि दलाई लामा ने भी करमापा दारजी का मान्यता इस लालच में दी थी कि चीन तिब्बत के सवाल पर उनसे बात करेगा। कुछ ने सही तो कम से कम उनकी तिब्बत वापसी और तिब्बत का थाड़ी बहुत स्वयात्तता देगा। यह अभियान चीनी कूटनीतिज्ञां के माध्यम स 1में ब्राजील में हुए पृथ्वी सम्मेलन के दौरान चलाया गया था। लकिन कहते हैं कि करमापा दोरजी चीन सरकार की खोज थे। फिर जिस तरह से सन 2000 में करमापा दोरजी का चोरी-छिपे भारत में घुसने की जरूरत पड़ी उसे लेकर कई विवाद भी उपजे हैं। कुछ जानकारों का मानना है कि चीन न यह सुनियोजित तरीके से किया, ताकि भारत और पश्चिम में करमापा दोरजी के प्रभाव का इस्तेमाल किया जा सके। पर ताजा सच यह है कि करमापा दोरजी 15 जून से अमेरिका जा रहे हैं, जो चीन को सुहा नहीं रहा है। तिब्बत के खाम रीजन में 26 जून 1में जन्म यह करमापा दोरजी तिब्बती बौद्ध धर्म के कर्मा कग्यु संप्रदाय के हैं। इस समुदाय का धार्मिक नेता पद ग्रहण करने के बाद खास किस्म की काली टोपी पहनता है। इस समुदाय का मुख्य केंद्र तिब्बत की तोलंग घाटी में है। पर इसके ज्यादा अनुयायी सिक्िकम और भूटान में हैं। पश्चिम में भी इसी तिब्बती बौद्ध संप्रदाय के सबसे ज्यादा अनुयायी हैं और न्यूयार्क में बाकायदा इसका बौद्ध विहार है, जिसे संप्रदाय के एक प्रमुख केंद्र का दर्जा प्राप्त है। करमापा घुमन्तू जाति में जन्म हैं। करामापा खोजी टीम की खोज से पहले ही करमापा दारजी ने बचपन में ही अपन परिजनों का बता दिया था कि व करमापा हैं। सात वर्ष की उम्र में पूर्व करमापा के पत्र में लिख सूत्रों के आधार पर ताई सितुपआ की टीम ने करमापा दोरजी का खोजा। उनकी खोज के बाद उन्हें तिब्बत स्थित करमापा के पारम्परिक मठ में रखा गया। वहां व करीब सात साल रहे।

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