अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सीताकांत का सत्य-संधान

उड़िया के यशस्वी साहित्यकार सीताकांत महापात्र से अरसा बाद पिछले 2मार्च को कोलकाता में एक साहित्य समारोह में भेंट हुई। सीताकांत से मेरा बहुत पुराना परिचय है और उनसे कोलकाता, दिल्ली व अन्यत्र कई बार मेरी मुलाकातें हुई हैं। सीताकांत ने उड़िया गद्य साहित्य खास कर निबंध और यात्रा-वृतांत में कई उल्लेखनीय कृतियां दी हैं, किंतु वे विख्यात हैं एक समर्थ कवि के रूप में ही। उनकी काव्य यात्रा 55वें वर्ष में प्रवेश कर गई है और आज भी उनकी सृजन-सक्रियता बनी हुई है। उन्होंने कविता लिखना शुरू किया था-1में, जब अपना गांव, घर-बार, परिजन व नाते-रिश्तेदार छोड़ कर कटक में रावेनशॉ महाविद्यालय के छात्रावास में गए। वह कविता उनके पहले काव्य-संग्रह ‘दीप्ति ओ द्युति’ में संकलित है। संग्रह की भी पहली कविता वही है। यह संग्रह हालांकि उसके दस साल बाद 1में आया था, लेकिन आते ही उड़िया साहित्य-जगत में छा गया था। इस संग्रह के जरिए सीताकांत ने उड़िया कविता को एक ऐसा मुहावरा दिया था, जो जितना संप्रेषणीय था, उतना ही अपनी संरचना में क्षिप्र और लय में आकर्षक। दूसरे काव्य संग्रह ‘अष्टपदी’ में उन्होंने मिथक रचना की प्रचलित कला का अतिक्रमण कर पाठकों को चकित किया। सीताकांत जानते थे कि उड़िया की काव्य-संवेदना मूलत: मिथक केंद्रित है, इसलिए उन्होंने मिथक रचना की अपनी भिन्न शैली खोजी। उनके द्वारा प्रयुक्त मिथक अनायास ही रूपक बन गए। सीताकांत ने एक बड़ा काम यह भी किया कि खामोशी के साथ मुहावरे के स्थान पर विचार को रख दिया। ‘शब्दर आकाश’ संग्रह से सीताकांत की काव्य-यात्रा एक नए पड़ाव पर आ पहुंची। उसमें उन्होंने जातीय स्मृति के रूप में मिथकमाला का सृजन किया। इस संग्रह में जातीय स्मृति और निजी स्मृति के दृश्य बंध विस्मय का भाव जगाते हैं। कवि के भीतर हमेशा अपने आसपास का जीवन राग गूंजता रहता है। सीताकांत अपने गांव के छोर पर स्थित छोटे से मंदिर में अच्युत, यशोवंत और भीम भोई के भजन-स्वर सुनते हैं तो हैजे से ग्रस्त गांव के तिमिर अंधकार में नीरवता की नितांत भयानक आवाज और देवी मंगला की मनुहार करनेवाला संकीर्तन भी और वर्षा, अगणित मृत्यु, स्मृतिजन्य अनुराग और जन्म, रुग्णता और मृत्यु को चित्रित करते हुए गुजरते मौसम के स्वर भी। परवर्ती काव्य संग्रहों - ‘समुद्र’, ‘चित्रनदी’, ‘आरदृश्य’, ‘समयर शेष नाम’, ‘काहाकु पुच्छिबा कह’, ‘चढेइ रे, तु कि जाणु’, ‘फेरि आसिबार बेल’, ‘श्रेष्ठ कविता’, ‘वर्षासकाल’ में भी सीताकांत की प्रातिभ उर्वरता और प्रौढ़ता हम देखते हैं। प्रातिभा उर्वरता उन्हें रचनात्मकता के शिखर पर बिठाती है। इस शिखर पर कोई सर्जक कैसे पहुंचता है? यह तभी संभव होता है, जब कवि, कविता और कवि-धर्म में सहज सामंजस्य स्थापित हो जाता है, जब पाठक भी कवि के साथ हो जाता है। सीताकांत का काव्य दर्शन समय-निरपेक्ष और समाज-सापेक्ष है। उनकी कविता में प्रत्येक शब्द बोलता है। अपरिहार्य होता है। अद्वितीय होता है। महान कविता वह है, जिसमें शब्द खामोशी से बोलते हैं। सीताकांत की एक कविता में कहते हैं -एक शब्द गढ़ा जाएगा इसलिए रंग बदलता है आकाश हजार बार गाता है पवन कई तरह से गीत रोता है, मुसकुराता है समुद्र टकराता है गूंगी रेत से ताकती रहती है चातक-सी सर्वसहा बसुंधरा एक शब्द गढ़ा जाएगा इसके लिए हैं जरूरी सौ जन्म और सौ मृत्यु। आशय यह है कि शब्द की साधना के लिए, शब्द के परिष्कार के लिए एक ही जीवन काफी नहीं है। जिस तरह एक महान चित्रकृति हमेशा सत्य के संधान में लगी रहती है, उसी तरह सीताकांत के शब्द भी सत्य के संधान में संलग्न दिखते हैं। सीताकांत इसी संधान में संलग्न रहे हैं कि मनुष्य का मंगल कैसे होगा? वे हमारे समय के एक विशिष्ट कवि तो हैं ही, लेकिन उनके गद्य के लिए भी यही बात सही है। उनके निबंध संग्रह ‘भिन्न आकाश, भिन्न दीप्त ’, ‘निस्संग मणिष’, ‘शब्द स्वप्न ओर निर्भीकता ’, ‘अंधारर झोटिचित्र’ उड़िया में बहु प्रशंसित और बहुपठित रहे हैं। उन्होंने विपुल मात्रा में आदिवासी काव्य की रचना की, जिनमें प्रमुख हैं- ‘द एम्प्टी डिस्टेंस केरिज ’, ‘द वुडन स्वोर्ड’, ‘स्टेइंग इन नोव्हेयर ’, ‘फॉरगिव द वर्ड्स ’, ‘बाखें : रिचुअल इनवोकेशन सांग्ज ऑफ ए प्रिमिटिव कम्युनिटी’, ‘मेन पैटर्न्‍स ऑफ डस्ट’, ‘द अवेकेण्ड विण्ड’, ‘द एण्डलेस बीव : ट्राइबल सांग्ज ऐण्ज टेल्स ऑफ ओडिसा’, ‘अन-एण्डिंग रिदम्स : ओरल पोयट्री ऑफ द इण्डियन ट्राइब्ज’। सीताकांत महापात्र ने अनेक महान रचनाओं का अनुवाद कर भाषा बंधन का काम भी किया है। अनुवाद से ही भारतीय भाषाएं निकट आएंगी।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: सीताकांत का सत्य-संधान