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रोइएोार-Êाार क्यूँ, कीजिए हाय-हाय क्यूँ

हिन्दी के अधिकतर मीडियाकारों और स्तंभलेखकों को नई अर्थव्यवस्था, पूँजीवाद और बाजार-व्यवस्था की समसामयिक छीछालेदर की पुरानी आदत है। आदतन होने वाली प्रतिक्रिया (कंडिशंड रिफ्लेक्स) को परखने के लिए कभी रूसी मनोवैज्ञानिक पावलोव ने एक प्रयोग अपने कुत्ते के साथ किया था। खाना देने से पहले वे एक घण्टी बजाते थे, और जहाँ घण्टी बजती, कुत्ते के मुँह से आदतन लार टपकने लगती थी। किसानी आत्महत्याओं तथा ताजा अन्न संकट को लेकर काफी कुछ ऐसा ही ‘पावलोवियन रिफ्लेक्स’ इन दिनों हमारे मीडिया में कई जगह दिखाई दे रहा है। कम से कम इस बात का श्रेय तो हमें अपने लोकतंत्र को देना ही होगा कि हमारी चुनी सरकारें चाहे कितनी ही निकम्मी क्यों न निकली हों (और हमीं क्या कम निकम्मे चयनकर्ता रहे हैं), लेकिन उन्होंने हर हिन्दुस्तानी पेट के लिए जैसे-तैसे अन्न का प्रबंध तो किया ही है। दूसरा श्रेय हमें हरित क्रांति और श्वेत क्रांति को भी देना होगा, जिन्होंने देश को अन्न के मामले में आत्मनिर्भरता दी और दूध तथा डेरी पदार्थो की किल्लत घटा कर लाखों दुग्ध उत्पादकों को मालामाल किया है। जहॉं तक हमारी अन्न उत्पादक क्षमता की बात है, विघ्नसंतोषियों को राष्ट्रीय विकास परिषद (नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल) की उपसमिति की वह मई, 2007 की रपट पढ़ लेना चाहिए जिसमें योजना आयोग को सूचित किया गया है कि भारत अगर कमर कस कर काम करे तो देश के मौजूदा गेहूँ उत्पादन में 3 करोड़ टन (यानी 40 प्रतिशत) तक की बढ़ोतरी संभव है, और यही नहीं, धान का उत्पादन भी दूना किया जा सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की राय में फिलवक्त देश के अनेक राज्यों में कृषि-भूमि क्षमता से कहीं कम पैदावार दे रही है। विश्व के बड़े अन्न-उत्पादक देशों (चीन, अमेरिका तथा आस्ट्रेलिया) की तुलना में हमारे कुछ राज्य, जैसे पंजाब, पश्चिम उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान लगभग उनके ही जितना (प्रति हेक्टेयर 3.5 से 4.5 टन) अन्न पैदा कर रहे हैं। पर (शेष) उत्तर प्रदेश उतनी ही भूमि पर उनसे आधा अन्न उगा रहा है जबकि प्रदेश में देश के सबसे बड़े भू-भाग (0 लाख हेक्टेयर) पर खेती होती है। अगर वह अपने किसानों तक बेहतर तकनीकी और सिंचाई की व्यवस्था पहुँचाने का प्रबंध कर ले तो अकेला उ.प्र. देश के वर्तमान खाद्यान्न भण्डार में 1 करोड़ 20 लाख टन अतिरिक्त अन्न जोड़ देगा। इसी तरह (देश के दूसरे बड़े राज्य) मध्य प्रदेश में आज 40 लाख हेक्टेयर जमीन पर गेहूँ की खेती होती है। जरूरी कृषि सुधारों द्वारा गेहूँ का उत्पादन वहाँ भी 84 प्रतिशत तक बढ़ाना संभव है। बिहार में भी वर्तमान फसल उत्पादन 100 प्रतिशत और महाराष्ट्र में 150 प्रतिशत बढ़ सकता है। यानी मात्र तीन राज्य : बिहार, मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र अगर अपने कृषकों को बेहतर बीज, सिंचाई, खाद और वैज्ञानिक जानकारियों सहित नई तकनीकी से जोड़ सकें, तो वे 1 करोड़ 10 लाख टन अतिरिक्त गेहूँ पैदा कर सकते हैं। धान के मामले में हमारे विभिन्न राज्यों में (सिंचाई सुविधाओं तथा भौगोलिक बनावट की भिन्नताओं के कारण) विसंगतियाँ हैं। 44 प्रतिशत धान उत्पादक किसान वर्षा भरोसे ही हैं। झारखण्ड जैसा राज्य उनमें से एक है, जो अपनी क्षमता से 35 प्रतिशत कम फसल ले रहा है। फिर भी झारखण्ड, उत्तर प्रदेश और बिहार यह तीन राज्य आज पूरे देश के कुल चावल का 20 प्रतिशत पैदा करते हैं। तीनों में स्थिति सुधार ली जाए तो सिर्फ उत्तर प्रदेश और बिहार ही प्रतिवर्ष क्रमश: 2.5 करोड़ और 3 करोड़ अतिरिक्त चावल पैदा करने लगेंगे। छत्तीसगढ़ के सिंचित इलाकों में तो धान का उत्पादन वर्तमान से 170 प्रतिशत तक और गुजरात में वर्तमान से 105 प्रतिशत तक बढ़ाना संभव है। पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में भी, जहाँ वर्षा प्राय: अच्छी होती है उत्पादन दूने से अधिक किया जा सकता है। सवाल सहज उठता है कि आस्ट्रेलिया और चीन की तुलना में हमारे किसान अपनी जमीन की क्षमता से इतना कम उत्पादन क्यों कर रहे हैं? इसकी मोटी वजहें पाँच हैं। पहली और सबसे बड़ी वजह यह, कि आजादी के बाद उत्तरी राज्यों में कृषि पर शोध तथा बेहतर तकनीकी की ईजाद के लिए गठित तमाम सरकारी एक्सटेंशन एजेंसियाँ मृत या लगभग मृतप्राय हैं। और किसानों तक हरित-क्रांति विषयक नया शोध, वैज्ञानिक विचार और नई तकनीकी के सही प्रयोग से जुड़ी बहुमूल्य सूचनाओं को पहुँचाने की बजाए वे जातीय राजनीति और भ्रष्टाचार के अखाड़े बन कर रह गई हैं। नतीजतन हमारे किसान भाई सुनी-सुनाई के आधार पर बिना स्थानीय स्थितियों का आकलन किए अच्छी कीमत देने वाली फसलें बोने के ताबड़तोड़ फैसले ले लेते हैं, और नियमित अंतराल पर नए बीजों का प्रयोग करने की बजाए अक्सर पुराने भंडारित बीजों से ही काम चलाते हैं। उधर नई तकनीकी और रासायनिक खाद के स्वरूप, गुण-दोष और गलत प्रयोग के खतरों की बाबत भी अभी ज्यादातर किसानों को विश्वस्त और योजनाबद्ध जानकारियाँ नहीं मिल पाई हैं। नतीजतन वे रासायनिक खाद का जरूरत से अधिक और अनापशनाप प्रयोग करके जमीन को ही नुकसान नहीं पहुँचा रहे, खुद भी गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। डीडीटी जैसे कीटनाशक के अवैज्ञानिक छिड़काव से फसलों की गुणवत्ता भी दुष्प्रभावित हो रही है। कृषि क्षेत्र के पिछड़ेपन की अंतिम वजह है देश में जल संसाधनों की स्थिति और उनके रखरखाव की नितांत शिथिल व्यवस्था, जो भ्रष्टाचार के घुन से बुरी तरह पीड़ित है। सरकार की तमाम जनमुखी एक्सटेंशन इकाइयों को ही चुस्त और कारगर बनाने की एक गंभीर मुहिम छेड़ी जा सके, तो इनमें से बहुत सारी समस्याएँ तो स्वत: सुलझने लगेंगी। लेकिन अफसोस यही है, कि जिस वक्त सरकार को इसकी व्यवस्था करनी चाहिए थी, वह किसान कर्जा-माफी जैसी मजाकिया घोषणा कर देती है, जिससे वर्तमान् स्थिति में सिर्फ राजनैतिक पहुँच वाले चतुर और सम्पन्न किसानों की दुनियादारी का ही सुरक्षा-बीमा होगा। इस वक्त सरकार के केंद्रीय पूल में 40 लाख टन का गेहूँ का स्टॉक मौजूद है। और कुछ ही सप्ताह बाद एफसीआई सरीखी सरकारी भण्डारण संस्थाएँ उत्तरी भारत की गेहूँ मण्डियों में नई फसल की खरीद को जा खड़ी होंगी। सरकार इस बार 1000 रु. प्रति कुंतल की दर से गेहूँ खरीदेगी जो पिछले साल की दर से 250 रु. अधिक है। लेकिन गेहूँ की कम उपज और मण्डी में निजी खरीदारों की बढ़ती रुचि चलते क्या वह अपना परिलक्षित कोटा पूरा कर सकेगी, इसमें खुद कंपनी के उच्चाधिकारियों को भी शक है। ऐसे में तर्कसंगत राह यही बचती है, कि सरकार एक ओर तो अपनी कृषि संबंधी संस्थाओं में जान फूँके, दूसरी तरफ वह माल खुद अपने भण्डारों में भरने की जिद छोड़े और अच्छे नियामक नियुक्त कर रिटेल उद्योग को प्रोत्साहित करे। मुक्त बाजार के खतरों की काट मुक्त बाजार की स्पर्धा कर सकती है। अत: इससे किसानों को बेहतर दाम मिलेंगे, और उपभोक्ताओं को भी बाजार प्रतिस्पर्धा के चलते समुचित दामों पर अन्न उपलब्ध होगा। आखिर जब केरल की सरकारी कंपनी ‘सप्लाय को.’ ने आंध्र से खाद्यान्न खरीद कर राज्य में बेचा था, तो उसे तो क्या इसी रिटेल विरोधी लॉबी ने उसे मूल्य मैनेजमेंट का सुनहरा उदाहरण नहीं माना? बुजुर्ग कहते हैं कि हाथी लाना हो तो ड्योढ़ी ऊँची करनी होती है। दूसरी हरित क्रांति लाने के लिए, हमें भी अपनी संकीर्ण मानसिक ड्योढ़ी की ऊँचाई बढ़ानी होगी, और आँगन को टेढ़ा कहने की बजाए अपनी नृत्य क्षमता बढ़ानी होगी। वर्तमान अन्न संकट और जो हो, पूरे कृषि क्षेत्र की प्राथमिकताओं पर ईमानदार चिंतन का एक राष्ट्रीय अवसर तो हमें दे ही रहा है।ं

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