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कौन है ‘क्रेचाी’, मानसिक रूप से बीमार या फिल्मकार

आप किसी डॉक्टर से पूछें कि सीजोफ्रेनिया कितनी गंभीर बीमारी है तो वह बताएगा कि यह एक लंबी और परशान करने वाली बीमारी है। किन्तु हाल ही में रिलीज हुई फिल्म क्रेाी 4 को देखकर आप भ्रम में पड़ सकते हैं कि यह तो बीमारी जसी है ही नहीं। राजपाल यादव यानी गंगाधर इतिहास की पुस्तक लिखते-लिखते आजादी के आंदोलन के दौर में पहुंच जाता है और आजादी के लिए लड़ने लगता है, जो साठ साल पहले ही मिल चुकी है। फिल्म में इस पात्र को हास्यास्पद बनाकर पेश किया गया है, जबकि मेडिकल साइंस की मानें तो यह युवक एक लंबी और कष्टसाध्य बीमारी से गुजर रहा है। सीजोफ्रेनिया में पीड़ित व्यक्ित भ्रम में जीता है और जिन यादों या बातों में वह खो जाता है, उन्हें ही हकीकत मानने लगता है। भले वह दौर दो-चार सौ साल पुराना ही क्यों न हो। वह अपने बुने भ्रम में फंसता चला जाता है। सोच-समझ, भावनाओं और क्रियाओं के बीच कोई तालमेल नहीं रहता है। अक्सर ऐसे रोगी रोमर्रा की क्रियाएं करने में भी असमर्थ हो जाते हैं। फिल्म देखकर इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ित के घर वालों का दुखी होना बहुत स्वाभाविक है, जिनकी व्यथा और परशानी को फिल्म में कॉमेडी बनाकर परोसा गया है। विमहेंस अस्पताल के मनोचिकित्सक डा. जितेन्द्र नागपाल का कहना है कि ऐसे मरीाों का मनोजगत भयानक संकट से घिरा रहता है। हालांकि यह एक सामान्य बीमारी है, जो कई प्रसिद्ध फिल्म स्टार (परवीन बॉबी), लेखक, कवि और राजनेता भुगत चुके है। यह समस्या हर सौ में से एक व्यक्ित में पाई जाती है। अक्सर इस बीमारी के लक्षण 20 या 40 से 45 साल के बीच देखने को मिलते हैं। समय से पहचान हो जाने पर रोगी एक-दो साल में ठीक हो जाता है। पर कई बार सालों इलाज चलता है। वरिष्ठ मनोचिकित्सक डा. समीर मेहरोत्रा कहते हैं कि ऐसे विषयों पर फिल्म बनाने से पहले मिनोचिकित्सकों की राय ली जानी चाहिए, ताकि विषय को संजीदगी से पेश किया जा सके।

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