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राज दरबार : निगरुण

पहले नाम के साधु थे। अब सचमुच के साधु हो गए हैं। भजन गाने की कभी आदत नहीं रही है। इस कमी को उन्होंने दूसर तरीके से पूरी की है। उनके पास कई मोबाइल सेट हैं। उतने ही नम्बर भी हैं। पटना वाले मोबाइल का टोन बताता है कि उन्हें अकेलेपन का अहसास बेहद तल्खी के साथ हो रहा है। आप उनके नम्बर पर डायल करंगे। रिंग होते ही निगरुण सुनाई देगा-सुख के सब साथी, दुख में न कोई..। अब दिल्ली वाले नम्बर का धुन सुनिए-महावीर विक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी। पुराने दरबारी कहते हैं कि उनकी संगति भी सुधर गई है। इधर-उधर नहीं जाते हैं। बस, अपनी कुटिया में पड़े रहते हैं।ड्ढr ड्ढr बधाईड्ढr कभी आग उगलने वाले भोला बाबू इन दिनों कूल-कूल रह रहे हैं। दरबारियों को उनका यह रंग रहस्यमय लग रहा है। निजी बातचीत में भी वही विनम्रता। चालू किस्म के लोग बधाई भी दे रहे हैं। वे इसे कबूल भी कर रहे हैं। यह खुशी एक विचाराधीन फामरूले से पैदा हुई है। उनकी पार्टी में इस फामरूला पर विचार चल रहा है कि विधान परिषद के सदस्य मंत्रिमंडल में न भेजे जाएं। यह फामरूला लागू हो गया तो भोला बाबू को बिरादरी के कोटे से जगह मिल जाएगी। बिरादरी के ही एक विधान पार्षद बड़ी मजबूती से लाइन में लगे हुए हैं। फामरूला के अलावा उन्हें लाइन से अलग करने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है।ड्ढr ड्ढr महंगाईड्ढr नेताजी राजद में हैं और महंगाई की मार से बेहाल हैं। हालांकि, रुपये-पैसे की कमी से यह बदहाली नहीं है। वजह यह है कि मैडम राजनीति के प्रति अचानक जागरूक हो गई हैं। नेताजी बाहर में दहाड़ते रहते हैं। राज्य सरकार को पानी पी-पी कर कोसते रहते हैं। मगर घर पहुंचते ही बोलती बंद हो जाती है। लाख समझाने के बावजूद मैडम इस बात पर अड़ी हुई हैं कि महंगाई के लिए केंद्र सरकार जिम्मेवार है। क्योंकि केंद्र की सरकार को राजद का भी समर्थन मिला हुआ है, इसलिए नेताजी भी जिम्मेवार हैं। नेताजी ने बीच का रास्ता अपनाया है। अब रसोई के सामानों की खरीददारी खुद कर रहे हैं। मैडम को सभी सामानों का दाम कम बता कर अपनी जान बचा रहे हैं।ड्ढr ड्ढr समझदारड्ढr पुलिस मुख्यालय के छोटे साहब इन दिनों पाठशाला चला रहे हैं। रो नए-नए छात्र और सबके लिए अलग-अलग पाठ। उस दिन एक मंद बुद्धि किस्म के छात्र से उनका पाला पड़ा। छोटे साहब ने तीन विधायकों के मामले से जुड़ी जानकारी मांगी। छात्र ने चार-पांच किलो वजन की फाइल थमा दी। साहब बोले-ब्रीफ दीजिए। छात्र का जवाब था-हम बताते हैं आप नोट करते जाइए। तीन बार कहा। जवाब वही रटा-रटाया मिला। चौथी बार साहब ने आंखें कड़ी कीं। छत की ओर देखते हुए बोले-ाो कह रहे हैं, समझ लीजिए। बाद में सुखी रहिएगा। कहने की जरूरत नहीं है कि छात्र की अक्ल से पर्दा उठ गया था। कुछ ही देर में विधायकों के मामले का ब्रीफ तैयार हो गया।ड्ढr ड्ढr राहतड्ढr विधानमंडल के लंबे सत्र के समापन पर एक मंत्री महोदय बेहद खुश हैं। इतना खुश कि उनका वश चले तो सदन की बैठक होने ही न दें। जन्मजात समाजवादी पृष्ठभूमि के मंत्रीजी सदन में जवाब देते वक्त अक्सर हांफने लगते थे। परशानी अधिक बढ़ी तो बीच का रास्ता भी निकाला। सवाल पूछनेवाले विधायकों से पहले ही बात कर लेते थे। यहां तक कि एक दिन परिषद की लॉबी के टॉयलेट में भी कुछ सदस्यों को लेकर घुस गए। आराू इतनी भर थी कि अगर सदन में राजा मौजूद रहें तो अधिक फाीहत मत कीािएगा। बाद में हमलोग बात कर लेंगे। मगर यह रास्ता भी कुछ दूर चलने के बाद बंद हो गया। पूर सत्र में उनकी खूब फाीहत हुई। अब राहत की सांस ले रहे हैं।

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