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जागरूकता को पप्पू से आगे ले जाना होगा

ार्यक्रम का नाम था- कौन बनेगा प्रधानमंत्री, एक समाचार चैनल पर इसका सीधा प्रसारण हो रहा था। निजी आरोपों का दौर चल ही रहा था कि कुछ लोग मिट्टी के घड़े, बोतल ले कर आ गए, पहले नारे फिर शोर और आगे हुड़दंग हो गया -पानी दो—पानी दो-। कहां तो प्रधानमंत्री के चयन पर विमर्श होना था, बात आ कर टिक गई पानी पर, यानी नगरपालिका स्तर के मुद्दे पर। कुछ गांवों में लोगों ने प्रत्याशी के घुसने पर रोक लगा दी है, काले झंडे लगे हैं- कारण : सड॥क, बिजली या कोई स्थानीय विषय। यह हमारे देश का 15वां संसद का चुनाव है, यदि इंसान की उम्र से गिने तो किशोरावस्था कहलाएगी। लेकिन समूची प्रक्रिया को देखें तो बहुत कुछ बचकाना लगता है। मतदाताओं की क्या कहें, खुद नेताओं को भी नहीं मालूम है कि लोकसभा और नगरपालिका के चुनावों के मुद्दों का निर्धारण कैसे होना चाहिए। कहीं जाति-संप्रदाय के नाम पर वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश हो रही है ता कहीं क्षेत्र, भाषा के आधार पर वोट देन का प्रलोभन। देश, नीतियां, आचार संहिता, घोषणा-पत्र सब कागजी बातें बन कर रह गए हैं। संसद से ले कर पंचायत स्तर तक चार प्रकार की निर्वाचित संस्थाएं हैं- लोकसभा, विधान सभा, नगर निगम या फिर ग्राम व जिला पंचायत। प्रत्येक संस्था के कार्यक्षेत्र, अधिकार, अलग-अलग हैं। जाहिर है कि इनके लिए चुनाव लड़ने वालों से अपेक्षाएं, अहर्ताएं भी अलग-अलग ही होंगी। लकिन 15वीं लोकसभा की चुनाव प्रक्रिया में यह अंतर कहीं नहीं दिख रहा है। खुद को राष्ट्रीय व राष्ट्रभक्त कहने वाले दल निर्वाचन क्षेत्र की जाति-गणना के अनुसार गोटियां बिठा रहे हैं। लोकसभा क्षेत्र के नए परिसीमन में एक-एक सीट में तीन-चार जिले तक शामिल हो गए है। लिहाजा प्रत्येक उम्मीदवार अपने ही निर्वाचन क्षेत्र के बड़े हिस्से में ‘बाहरी’ करार दिया जा रहा है। यहां इस बात को नजर अंदाज किया जा रहा है कि चुनाव राष्ट्रीय है और यदि योग्यता है तो देश के किसी भी हिस्स का व्यक्ित कहीं से भी चुनाव लड़ सकता है। मध्यप्रदेश के शरद यादव और अटलबिहारी वाजपेयी क्रमश: बिहार और उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ते रहे हैं, आंध्र प्रदेश के बंगारू लक्षमण या पंजाब के बूटा सिंह भी राजस्थान आते रहे हैं। तो फिर ऐसे में स्थानीय या बाहरी के मुद्दे बेमानी हो जाते हैं। इस बात पर जोर दिया जाना जरूरी है कि संसद सदस्य का चुनाव उसके क्षेत्र में घूमने वाले और राशन बांटने पर निगाह रखने वाले जन-प्रतिनिधि का कतई नहीं है। देश के सामाजिक, औद्योगिक, कृषि विकास लिए नीतियां बनाने, विदेश में भारत की प्रतिष्ठा, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर सांसद के चुनाव की बात अभी कोई नहीं कर रहा है। बिजली, पानी, पुलिस, सड॥क किसके अधिकार-क्षेत्र में है? इस बात को जानते-परखते हुए भी सियासी पार्टियां महज वोटरों का भावनात्मक दोहन करन के लिए इसकी बात करने लगती हैं। भले ही पिछली बार निर्वाचित सांसद आपके गांव में चुनाव जीतन के बाद नहीं आया हो, लकिन उसकी काबलियत को आंकने के लिए यह पूछना जरूरी है कि वह पिछले पांच साल में संसद की कितनी बैठकों में मौजूद थे, उन्होंने किन विषयों पर अपनी आवाज उठाई। गत पांच साल में सरकारी खजाने से औसतन एक करोड़ रुपए पाने वाले सांसद ने क्षेत्र और देशहित में क्या किया है? सालाना दा करोड़ यानी पांच साल में दस करोड़ की विकास निधि का इस्तेमाल कितना व कहां हो पाया? इन दिनों अधिक मतदान के लिए लोगों को प्रेरित करन के लिए कई संस्थाएं काम कर रही हैं। खुद चुनाव आयोग ‘पप्पुओं’ को जागृत करन का काम कर रहा है, लकिन क्या सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया गया वोट लोकतंत्र को ताकत देता है? इस सवाल पर वे सभी लोग आंखें फेर लेते हैं, जिनके नुमाइंदे बाड़मेर, इटावा या मुंबई में वोटरों को सरेआम नोट बांटते देखे जाते हैं। यह बात अब किसी से छुपी नहीं है कि इस साल चुनाव में कोई 2400 करोड़ रुपए गैरकानूनी तरीके से वोटरों को रिझान के लिए बांटे जाने हैं और इसका बड़ा हिस्सा बाजार में आ चुका है। इस पर कोई आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए, आखिर मुद्दाविहीन चुनाव से उम्मीद भी क्या की जा सकती है। लोकतंत्र का सबसे बड़ा पहरुआ मतदाता ही है और सुधारों की आस में पंद्रहवें पायदान पर पहुंच गए भारतीय निर्वाचन में मतदाता को शिक्षित करन का जिम्मा लेन को कोई आगे नहीं आ रहा है। यहां तक कि स्कूल और कॉलेज की पाठय़ पुस्तकों में भी संसद, विधानसभा के अधिकार व कर्तव्य की चर्चा तो है, लकिन अच्छे मतदाता के अधिकार या कर्तव्य पर कोई सामग्री नहीं है। कुछ लोग महज उथली बातें जरूर करते हैं- अपराधी या दागी छवि वाल को ना चुनें, या फिर बाहरी को ना चुनें या फिर देश-भक्त को ही चुनें। लकिन ये सभी नारे इस बात को सुनिश्चित नहीं करते हैं कि चुनन के बाद वह व्यक्ित दागी या भ्रष्ट नहीं बन जाएगा। आज भारत की संबसे बड़ी संवैधानिक संस्था के सामने बहुमत का संकट खड़ा दिख रहा है। कई-कई बेमेल मोर्चे खड़े हो गए हैं। छोटे दल किस तरह से सत्ता पर अपना जायज-नाजायज दखल रखते हैं, इसकी बानगी मौजूदा यूपीए और इससे पहले एनडीए सरकार के दौरान रोज देखन को मिलती रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि दलों की विभिन्न मसलों पर नीतियां क्या हैं, इसकी जानकारी आम मतदाता को होती नहीं है। आज जरूरत है कि निर्वाचन आयोग या ऐसी ही कोई स्वतंत्र संस्था, अर्थ, विदेश, शिक्षा, सामाजिक प्रगति, रक्षा, कृषि, आतंकवाद, सत्ता का विकेंद्रीकरण जैसे मुद्दों पर विभिन्न दलों के नजरियों को एक साथ रख कर मतदाता के सामने प्रस्तुत करे। यहां इस बात को भूला नहीं जा सकता है कि मतदाताओं की कोई आधी आबादी या तो निरक्षर है या फिर उसका अक्षर-ज्ञान बड़ी-बड़ी बातें समझन के लिए बौना है। ऐसे में फिल्मों, रेडिया कार्यक्रमों, पारंपरिक लोक कलाओं का सहारा लेना चाहिए। यह काम कुछ साल तक लगातार चले अलग-अलग संस्थाओं के चुनावों के दौरान विभिन्न पक्षों के मुद्दों का तुलनात्मक अध्ययन वोटर के सामने रखने से मतदाता को अपने वोट की सही ताकत का एहसास भी हो सकेगा। मतदाता को यह भी मालूम होना चाहिए कि वह अपने सांसद से क्या उम्मीदें रखें और उनका सरपंच क्या कर सकता है और क्या नहीं। यदि मतदाता जागरूक हो जाएगा तो चुनावों के बेमानी खर्चे, राजनीति के अपराधीकरण, आचार संहिता के पालन जैसी सभी बातें गौण हो जाएंगी। और तभी मतदान को लोकतंत्र का पावन-पर्व कहना सार्थक होगा। श्चड्डठ्ठद्मड्डद्भट्ठष्द्धड्डह्लह्वr1द्गस्र्न् ञ्चद्धoह्लद्वड्डन्द्य.ष्oद्व लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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