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शराब ही नहीं, पानी भी दो

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की राज्य सरकार इस चुनावी वर्ष को मद्देनजर रखते हुए प्रमुख दैनिक समाचार-पत्रों में अपनी तारीफों के संबंध में बड़े-बड़े विज्ञापन पिछले एक माह से प्रकाशित करा रही है। इस सरकार को भलीभांति पता है कि उसके राज्य की जनता पीने के पानी, बिजली, भारी महंगाई, बेरोगारी, कालाबाजारी, भ्रष्टाचार जसी गंभीर समस्याओं से लगातार जूझ रही है। कई स्थानों पर तो सर्दियों में भी लोगों को पीने का पानी सुगमता से नहीं मिल पाया। अब ग्रीष्म ऋतु में भला कैसे व कहाँ से मिल पाएगा। राजधानी में पिछले कई वर्षो से पीने के पानी की कालाबाजारी हो रही है, दिल्ली सरकार इसे रोकने में पूर्ण रूप से असफल रही है। दूसरी तरफ यह सरकार ऐसी ही कालोनियों, बस्तियों में रहने वाली गरीब जनता को मदहोशी में डूबे रहने के लिए गली, मोहल्लों, में शराब की दुकानें खोले जा रही है। मेरा दिल्ली सरकार व उसके मद्यपान निदेशालय से अनुरोध है कि वह अपनी समस्त शराब की दुकानों के पास ही एक-एक पीने के पानी का नल भी अवश्य लगवाए। इनमें पीने का पानी सुचारु रूप से आता रहना चाहिए, ताकि मदिरा प्रेमियों को तो पीने का पानी सुगमता के साथ उपलब्ध होता रहे।ड्ढr किशन लाल कर्दम, उत्तम नगर, नई दिल्ली कटघरे में साम्यवादी मुद्रास्फीति की दर 7.41 प्रतिशत पर पहुंच गई। केन्द्र में सत्तासीन ‘गरीबों व मजलूमों’ की पार्टी सीपीआई (एम) ने कहा है कि वह इसके लिए सरकार को कटघर में खड़ा करगी, जसा कि वह 123 समझौते व इसी किस्म के अन्य मौकों पर करती आई है। जवाहर लाल नेहरू ने गाँधी और उदारवादियों के ब्रिटिश शासन के खिलाफ संवैधानिक संघर्ष की रणनीति पर अपना विरोध प्रकट करते हुए कहा था कि ‘जिस संविधान को हम मानते नहीं, उसके खिलाफ संवैधानिक संघर्ष कैसा?’ यह नीतियों की बात थी। आज यूपीए सरकार का ‘बायां भाग’ सरकार में रहते हुए उसका विरोध करता है। यूपीए और साम्यवादियों के बीच जो विरोध है, वह भी नीतियों का ही है, लेकिन कैसी नीतियाँ? क्या भारतीय साम्यवादी दलों की कोई नीतियाँ हैं? समझ नहीं आता कि भारतीय साम्यवादी माक्र्सवाद-लेनिनवाद का भारतीयकरण कब करंगे? आज केन्द्र में ज्यादा जरूरत ऐसी स्थाई सरकार की है, जो बढ़ती विकास दर को दिशा और गति दे। साम्यवादी दल अरुणाचल व तवांग मुद्दों पर कुछ भी बोलने से कतराते हैं, शायद उन्हें राष्ट्रीय हित से ज्यादा चीन के हित की चिंता है। आज भारत का भू-क्षेत्र प्रभावित हो रहा है। इस पर चुप्पी क्यों? समय आ गया है कि साम्यवादी इन प्रश्नों का जवाब जनता को दें।ड्ढr प्रशान्त राय, 1024 मुखर्जी नगर, दिल्ली दर्द की मुकम्मल दास्तान दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ (7 अप्रैल) में प्रमोद जोशी का लेख ‘गुजर हैं लाख बार इसी कहकशाँ से हम’ पढ़ा। बहुत ही अच्छा लगा। लेखक ने बड़ी बेबाक़ी से जनाए-उर्दू को क़फन और कब्रिस्तान से निकाल कर नई रूह, नई जान, और उसका वाजिब हक देने और दिलाने के लिए सभी को ललकारा है। कौमी आवाा, शमा, सुषमा और बीसवीं सदी आदि उर्दू अखबार एवं जरीदे के जवाल और मैयत पर आंसू बहाते-बहाते लेखक ने अल्पसंख्यक मुसलमान के दुख-दर्द ोदभाव, सलूक और हकूक की मुकम्मल दास्तान लिख दी। मुसलमानों की तबाही-बर्बादी के लिए मीडिया भी कम जिम्मेदार नहीं है क्योंकि आम बेकसूर मुसलमान थाना-पुलिस, संसद तथा न्यायालय तक आसान पहुँच नहीं रखते किन्तु मीडिया इन तक तो पहुँच सकती है।ड्ढr मो. शहाब हैदर, हस्तसाल, उत्तम नगर, नई दिल्ली अवैध वैध कैसे? दिल्ली की 1500 से भी अधिक अवैध कालोनियाँ बिना सुधार के वैध कैसे हो सकती हैं? समझ से पर है। लेकिन नेता और नौकरशाह सिर्फ वोट-नोट के लिए बराबर इसकी रट लगा रहे हैं। दिल्ली ऐसे में कैसे विश्व की सुन्दर नगरी होगी और कैसे साँस लेने लायक भी रह पाएगी?ड्ढr वेद मामूरपुर, नरेला, दिल्लीं

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