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खुद अपने बहानों में फँस गई सरकार

बहाने बनाने में सरकारों का जवाब नहीं। घपलों में फँसे मंत्री और अफसरों को बचाने के लिए मुख्यमंत्रियों ने भी फाइलों को ठंडे बस्ते में डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सूचना के अधिकार के तहत अब जब लोकायुक्त की रिपोर्ट पर कार्रवाई का हिसाब किताब माँगा जा रहा है तो अफसर बहानेबाजी पर उतर आए हैं।ड्ढr मंत्री और आला अफसरों के खिलाफ मिली शिकायतों की जाँच के लिए लोकायुक्त बैठाया गया है। लोकायुक्त की रिपोर्ट मुख्यमंत्री के जरिए विधानमंडल के पटल पर रखी जाती है ताकि दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जा सके। पिछले दिनों हिन्दुस्तान ने खबर छापी थी कि पिछले 10 सालों से लोकायुक्त की रिपोर्ट सदन के पटल पर नहीं रखी गई। आरटीआई टास्क फोर्स के प्रभारी शैलेन्द्र सिंह ने सूचना के अधिकार के तहत सरकार से पिछले 10 साल में लोकायुक्त की रिपोर्ट पर की गई कार्रवाई का ब्योरा माँगा था। सरकार ने ब्योरा तो नहीं भेजा लेकिन रिपोर्ट पर कार्रवाई न होने के कारण जरूर बताए।ड्ढr वर्ष 1में लोकायुक्त की रिपोर्ट पर कार्रवाई न होने का कारण खासा दिलचस्प है। लोकायुक्त की रिपोर्ट सतर्कता विभाग को मिली। सतर्कता विभाग ने यह रिपोर्ट संसदीय कार्य विभाग तक भेजने में चार साल लगा दिए। लेकिन तब तक विधानमंडल का सत्रावसान हो चुका था। फाइल वापस सतर्कता विभाग को भेज दी गई। इसके बाद फाइल का क्या हुआ किसी को पता नहीं। सरकार ने अपने जवाब में लिखा है कि इस बार में ताजा स्थिति क्या है इसकी सूचना आवास एवं शहरी नियोजन विभाग से ली जा रही है। सूचना प्राप्त होते ही मुख्यमंत्री के अनुमोदन के बाद सदन के पटल पर रखने की कार्रवाई की जाएगी।ड्ढr फाइल जब सतर्कता विभाग को लौटा दी गई थी तो वह आवास व नियोजन विभाग में क्या कर रही थी? इसका जवाब पत्र में नहीं है। वर्ष 1ी लोकायुक्त की रिपोर्ट पर कार्रवाई न होने का जवाब तो इससे भी ज्यादा दिलचस्प है। जवाब में कहा गया है कि सन् 2000 में तत्कालीन लोकायुक्त न्यायमूर्ति राजेश्वर सिंह का आकस्मिक निधन हो गया था। 2003 में लोकायुक्त संगठन द्वारा भेजी गई 1ी यह रिपोर्ट अहस्ताक्षरित थी। सरकार ने अपने जवाब में लिखा कि इस रिपोर्ट को दोनों सदनों के पटल पर रखने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार महाधिवक्ता का अभिमत प्राप्त किया जा रहा है। महाधिवक्ता के परामर्श के अनुसार आगे कार्रवाई की जाएगी। यानी पिछले छह साल से सरकार को अब तक महाधिवक्ता का परामर्श नहीं मिल सका है। सन् 2000 से 2002 और 2006-07 की लोकायुक्त की वार्षिक रिपोर्टों के बार में सरकार का कहना है कि इनका अभी परीक्षण चल रहा है। 2003 से 2005 के बीच के वर्षो की रिपोर्ट सरकार को मिली ही नहीं।ड्ढr सूचना के अधिकार टास्क फोर्स के प्रभारी श्री सिंह का कहना है कि यह विशुद्ध बहानेबाजी है। उन्होंने इन रिपोर्टों पर विभिन्न विभागाध्यक्षों द्वारा की गई कार्रवाई की प्रमाणित प्रतिलिपि भी माँगी थी जो नहीं मिली। इसके लिए वह फिर आयोग का दरवाजा खटखटाएँगे। ं

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