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आबादी बढ़ी पर सुविधाएं घटीं

पतली गलियां, पेड़ के नीचे ताश खेलते युवा, मंदिर में झाल-ढोलक की थाप पर गवई अंदाज में गाते-झूमते लोग, टोलियों में गप्पें मारती महिलाएं। इलाके में झांकते ही गांव की मिट्टी की खुशबू आने लगती है। दिगर बात है कि शहरों की चकाचौंध ने लोगों को कहीं का नहीं छोड़ा है। न गांव का आनंद मिलता है और न ही शहर की सुविधा। लोगों का जीवन त्रिशंकु के समान हो गया है। यह हाल है राजधानी में स्थित वार्ड नंबर-१८ की।ड्ढr ड्ढr 7 की दशक तक ग्रामीण संस्कृति से ओतप्रोत मीठापुर-बी एरिया, यारपुर मुसहरी, अम्बेदकर नगर, यारपुर मेस्तर पाड़ा, मीठापुर बाजार व चपरासी क्वाटर के इलाके में लोग बड़े आराम से रहते थे। न पानी का संकट न गंदगी का अंबार। कालांतर में आबादी बढ़ती गई और धीर-धीर यह इलाका शहर का रूप लेने लगा। शहरी बनने के चक्कर में लोगों ने ऊंची अट्टालिकाएं तो खड़ी कर दीं लेकिन अन्य शहरी सुविधाओं की ओर ध्यान नहीं दिया। नगर निगम को भी शहरी सुविधाएं मुहैया कराने की चिंता नहीं हुई। अब हाल यह है कि इस इलाके को गांव की संज्ञा दी जाए या शहर की या फिर कुछ और समझ पाना कठिन है। वर्तमान में वार्ड के इलाके का हाल बेहद खराब है। चलने के लिए सड़क नहीं, पीने के लिए शुद्ध पानी नहीं, रोशनी के लिए लाइट नहीं। स्लम क्षेत्रों में कुछ चापाकल गाड़े गये थे पर किसी का मुंडा नहीं है तो कुछ से पानी नहीं टपकता। 1.5 लाख की आबादी में आधे गरीब तबके के लोग हैं। गरीबों को रोगार भी उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में करं भी क्या। जीविकोपार्जन के लिए राहगीरों को लूटना ही पेशा है। भिखारी ठाकुर पुल के नीचे स्लम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों ने सड़क पर कब्जा कर लिया है। शाम ढलते की शराबियों का जमावड़ा लग जाता है। अपनी जमापूंजी से लाइट की व्यवस्था की : पार्षदड्ढr पटना (हि.प्र.)। पार्षद स्नेहा कुमारी के मुताबिक चुनाव जीतने के बाद उन्होंने जमापूंजी से गलियों में लाइट की व्यवस्था की। निगम प्रशासन द्वारा विकास कार्य नहीं कराया जाता है। आंगनबाड़ी केंद्र व जनवितरण प्रणाली की दुकाने कागजों पर ही चलती हैं। जलापूर्ति पाईप जर्जर है। नलों से गंदा पानी गिरता है। निगम ने 25 लाइट तो लगा दिया लेकिन उसके रख-रखाव की चिंता नहीं है। कई लाइट खराब भी हो चुकी हैं। स्थानीय लोगों के सहयोग से सार्वजनिक स्थानों पर मूत्रालय का निर्माण कराया गया है। विधायक निधि से दस सड़कें भी बनी हैं। बरसात के दिनों में जलजमाव की समस्या उत्पन्न हो जाती है। एक ही भवन में दो से तीन स्कूल चलते हैं।

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