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राजरंग

बेच दियो र, बेच दियो..खरीदना-बेचना व्यवसायी का काम है, लेकिन यह काम पोलिटिशियन करने लगें, तो सबके निशाने पर आ जाते हैं। इनका इ काम भी नहीं है। लेकिन इलेक्शन में खरीदने-बेचने का काम होने लगे, तो समझिये कुछ न कुछ गड़बड़ है। चुनाव प्रचार अब जोर पकड़ने लगा है। गली-नुक्कड़ में प्रचार का शोर बढ़ रहा है। इसके संग-संग एगो शोर और मच रहा है। बेच दियो र, बेच दियो..। एक बड़ी पार्टी के एगो नेताजी ने तो टिकटवे बेच दियो। का करं नेताजी, सब बेच रहा है, तो उ भी बेच रहे हैं। जिसको खरीदना है माल निकालो और खरीदो। खरीदनेवाला खरीद रहा है। जो नय खरीद सका वो चिल्ला रहा है। एसे खरीदने-बेचने के चक्कर में कई लोगों का टिकटवे कट गया। उ का करं, किसको अपना दुखड़ा सुनायें। ऊपर के नेता तक बात पहुंच नहीं सकती। ऊपर तक बात पहुंच गयी, तो समझो कितनों का टिकटवे कट जायेगा। लेकिन बिल्ली के गले में कौन बांधे घंटी ? जो बांधेगा उसका भी भाई लोग टिकट कटवा देगा। लेकिन जिसका कट गया, उ तो साहस जुटाइये सकता है।

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