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क्या हो गया अपने शहर को..

यकीन नहीं होता कि पुत्र अपने जन्मदाता की ही हत्या कर देगा। लेकिन राजधानी की दो घटनाओं ने रिश्तों की अवधारणा पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। अब कौन किसपर भरोसा करगा? क्या हो गया है रिश्तों को? क्यों उन रिश्तों में कटुता आ गयी है, जिन्हें समाज अभिन्न और पावन मानता था।ड्ढr ड्ढr अब इस सप्ताह राजधानी की तीन घटनाओं पर गौर करं जिनमें हर बार सम्बन्ध व रिश्ते तार-तार हुए। पहली घटना ऐतिहासिक सायंस कॉलेज में हुई जब छात्रों ने सम्मानित शिक्षक प्रो. अमरन्द्र नारायण की पिटाई कर दी। दूसरी और तीसरी घटनाएं प्राय: एक ही जैसी थीं। कलयुगी पुत्र ने नौकर के साथ मिलकर अपने पूर्व आईएसएस पिता की और एक दारोगा ने भी अपने पिता की हत्या कर दी। दोनों पुत्रों ने धन की लालच में अपने जन्मदाता को ही मौत की नींद सुला दिया। इन दोनों हत्याओं की चर्चा पूर शहर में है और वृद्धों में असुरक्षा का बोध घर कर गया है। वे सशंकित हैं। सोमवार को तो हद ही हो गयी जब पटनासिटी में एक पुत्री ने ही अपनी मां की हत्या कर दी। उधर पिछले महीने मार्च माह में दीघा में एक पिता ने ही पुत्र की हत्या कर दी थी।ड्ढr ड्ढr इन घटनाओं के मूल में मनोविज्ञान के शिक्षक और मनोचिकित्सक सामाजिक संरचना में बदलाव मात्र मानते हैं। उनके मुताबिक संयुक्त परिवार का टूटता स्वरूप, जीवन की आपाधापी, सबकुछ पा लेनी की ललक और गलाघोंटू प्रतिस्पर्धा के कारण ही पिता की जान लेने को पुत्र उतारू हो रहा है। वैसे कई समाजशास्त्रियों ने इन घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि ये खतरनाक वाक्यात हैं। इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।ड्ढr याद कीजिए बचपन को। ठेहुनिया मारता पुत्र जब अपनी लडख़ड़ाती कदमों पर पहली बार खड़ा होता है कैसे खुशी से पिता चहक उठते हैं। अंगुली पकड़कर चलना सिखानेवाले, दुनियादारी की पाठ पढ़ाने वाले और फिर शिक्षित और कॅरियर बनाने में पूरी तरह सब कुछ लुटा देने वाले पिता की यदि पुत्र गला दबाकर हत्या कर देगा तो समाज को सद्मा तो पहुंचेगा ही। सेवानिवृत्त आईएएस बीएन मिश्रा ने अपने दोनों बेटों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए क्या-क्या जतन किये यह तो बेटों की अंतरआत्मा ही जानती होगी। दारोगा मधुरन्द्र ने अपने रिटायर्ड आडीटर पिता अजरुन प्रसाद की गला कुछ पैसों के लिए दबा दी। महज 24 घंटे पहले की इस ताजा घटना में शामिल दारोगा मधुरन्द्र ने पिता की हत्या के पूर्व कहां सोचा होगा कि किस तरह पिता ने उनके साथ ही पांच भाइयों को इस मुकाम पर पहुंचाया होगा? बहरहाल ये घटनाएं विचलित करने वाली हैं। समाजशास्त्रियों की मानें तो उस प्रवृत्ति की पड़ताल होनी चाहिए जिससे रिश्ते कलंकित हो रहे हैं। आखिर पुत्र को इतना धनलोलुप होने से रोकना भी तो समाज का ही काम है।

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