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माता-पिता की लालसा भी आत्महत्या की वजह

‘बच्चों के नन्हे हाथों को चांद सितारे छूने दो, चार किताबें पढ़कर ये भी हम जसे हो जाएंगे।’ यकीनन बच्चों के आने वाले भविष्य की स्थिति को भांपकर इस मर्म को कविता का रूप दिया होगा। छात्रों में बढ़ रही आत्महत्या की प्रवृत्ति इस बात का एहसास कराती है कि दिन ब दिन बढ़ते किताबी बोझ और अभिभावकों के उलाहनों ने बच्चों का बचपन ही छीन लिया है और वह मौत को गले लगा रहे हैं। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में केवल पंद्रह दिनों के भीतर सात छात्र-छात्राआें ने आत्महत्या कर ली। इस घटना ने सबको झकझोर दिया है। पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में बोर्ड परीक्षा शुरू होने से लेकर अब तक लगभग 285 छात्र आत्महत्या कर चुके हैं। यही नहीं आज छात्रों का पढ़ाई संबंधी दर्द इतना ज्यादा बढ़ चुका है कि छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के मानसिक रोग विभाग में करीब सौ छात्र हर महीने आते हैं। मनोचिकित्सक इन हालातों के लिए स्कूल की व्यवस्था को तो जिम्मेदार ठहरा ही रहे हैं साथ ही वह इस बात की तरफ भी इशारा करते हैं कि छात्र स्कूल के तनाव के साथ अभिभावकों के उलाहनों से भी परेशान होकर हमारे पास आ रहे हैं। स्थितियां जब ज्यादा बिगड़ जाती हैं तो बच्चे आत्महत्या जसा कदम उठाना ज्यादा आसान समझने हैं। छात्रों में बढ़ रही आत्महत्या की प्रवृत्ति को लेकर चिकित्सा विश्वविद्यालय के मानसिक रोग विभाग में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। विभाग की बाल रोग आेपीडी में ऐसे अवसाद से पीड़ित छात्रों का गत वषोर्ं की तुलना में बड़ी संख्या में इजाफा हुआ है। यहां के मनोरोग विशेषज्ञ प्रा़े हरजीत सिंह ने कहा कि पहले मानसिक अवसाद से घिरे वे लोग ज्यादा आते थे, जिन्हें पढ़ाई के बाद अपनी सही मंजिल नहीं मिल पाती थी लेकिन पिछले छह वर्षो से वे छात्र आ रहे हैं जो स्कूल और घर में पढ़ाई के दबाव में मानसिक तनाव के शिकार हो चुके है। प्रो. हरजीत ने अनुसार छात्र स्कूल में होने वाली बेइज्जती और अभिभावक से मिलने वाले उलाहने को सहन नहीं कर पा रहे हैं। उनके मन में मरने का ख्याल यदाकदा आने लगता है जिसका प्रतिफल आत्महत्या है। इसी विभाग के बाल मनोरोग विषेशज्ञ प्रा़े प्रभात ने भी कहा कि ज्यादातर अवसाद पीड़ित बच्चे यही कहते हैं कि पढ़ाई के मामले में स्कूल से तो हम परेशान रहते ही हैं थोड़ी चूक हो जाने पर हमारे माता-पिता भी गुस्सा हो जाते हैं और उनका कटाक्ष हमारा जीना मुश्किल कर देता है। उन्होंने कहा कि ऐसे माहौल में ही बच्चे छोटी सी बात पर मौत को गले लगा लेते हैं। इलाहाबाद मनोविज्ञानशाला के निदेशक दिव्यकांत शुक्ल ने कहा कि महिला आयोग की पहल और माध्यमिक शिक्षा के निर्देश पर उत्तर प्रदेश के 350 स्कूलों के करीब 35 हजार बच्चों के बीच सर्वे करवाया गया, जिसके आधार पर पाया गया कि बच्चे माता-पिता की उम्मीद पर खरा न उतर पाने से हताश और आत्महीनता के शिकार हो जाते है। लिहाजा वह आत्महत्या के संबंध में सोचने लगते हैं।ं

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