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पटरी पर मैत्री

ोलकाता और ढाका के बीच मैत्री एक्सप्रेस रल सेवा की शुरूआत भारत-बांग्लादेश संबंध सुधार की एक प्रतीक है। इससे दोनों देशों की जनता को एक-दूसर के नजदीक आने का अवसर मिलेगा।1में बांग्लादेश के उदय के बाद पहले से मौजूद यह रलमार्ग फिर खोला जा सकता था, पर दोनों के बीच संदेह के चलते संभव नहीं हुआ। देर से ही सही, यह फैसला राजनीतिक विवादों से ऊपर उठकर जनता के बीच सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत बनाने में सरकारों के संकल्प का द्योतक है। इससे द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। 2001 में एक समझौते के तहत दोनों देशों के बीच मालगाड़ियों का आवागमन शुरू हुआ, पर उसमें हाई कैपेसिटी के वैगनों की इजाजत नहीं दी गई। उससे व्यापार वृद्धि को अपेक्षित बल नहीं मिल पाया। अब यह उम्मीद बांधना निराधार नहीं है कि हाई कैपेसिटी के वैगनों वाली मालगाड़ियों के आवागमन के प्रयास किए जाएंगे। बांग्लादेश की शिकायत रही है कि व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में है, जिसे उक्त प्रयास के जरिए आंशिक रूप से पाटना संभव है। अवैध बांग्लादेशी घुसपैठ हो या सीमांकन, नदी जल प्रबंधन हो या बांग्लादेश में उत्तरपूर्व के उग्रवादियों को शरण या फिर कट्टरपंथी तत्वों को प्रश्रय- ये मुद्दे दोनों देशों के संबंधों में कटुता पैदा करते रहे हैं। वैश्वीकरण के मौजूदा युग में पूंजी, टेक्नोलॉजी, सूचना और जनता के मुक्त आवागमन के जरिए विभिन्न देश अपने यहां विकास को बढ़ावा दे रहे हैं तो दक्षिण एशियाई देश इससे कैसे अछूते रह सकते हैं? शायद यही अहसास उन्हें राजनीतिक व अन्य तरह के विवादों को नारअंदाज कर व्यापार वृद्धि व जनता के आपसी रिश्ते मजबूत करने को प्रेरित कर रहा है। भारत व पाकिस्तान समझौता एक्सप्रेस, नई दिल्ली-लाहौल बस सेवा, थार एक्सप्रेस के जरिए पहल पहले ही कर चुके हैं। बांग्लादेश के साथ यह शुरूआत बहुत पहले की जा सकती थी, क्योंकि उसके मुक्ित संग्राम में भारत का महत्वपूर्ण योगदान रहा था। फिर भी, देर आयद, दुरुस्त आयद!

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