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पवित्र मशाल और सुलगते सवाल

शांति और विश्व बंधुत्व की संदेशवाहक ओलम्पिक मशाल को हथियारबंद चीनी सुरक्षाकर्मियों से घिरा हुआ देखकर विश्वास नहीं हुआ। कारण, जो ज्योति खुद शांति का प्रतीक है। जो इस वर्ष बीजिंग ओलम्पिक खेलों से पूर्व ओलम्पिक आदर्शो और भावना का संदेश लिए विश्व के विभिन्न देशों का भ्रमण कर रही हो, स्वयं उसे कमांडो सुरक्षा की जरूरत पड़े। इन अंतरराष्ट्रीय खेलों के साथ इससे अधिक अपमानजनक व्यवहार और हो ही नहीं सकता। इस पवित्र मशाल को बीजिंग पहुंचने से पहले ही चीनी सुरक्षा कर्मियों के दल ने अपनी कार्यवाहियों से अपवित्र कर दिया है। लंदन, पैरिस, सेनफ्रांसिसको आदि सभी स्थानों पर तिब्बतियों के विरोध के कारण जसी सुरक्षा व्यवस्था मेजबान देशों को करनी पड़ी, मार्ग के दोनों ओर अवरोध लगाए गए, बड़ी संख्या में स्थानीय पुलिस तैनात की गई, उससे तो ओलम्पिक खेलों की मूल भावना ही अवरुद्ध हो गई। अब 17 अप्रैल को ये मशाल दिल्ली पहुंच रही है, वहां भी भारत में रह रहे तिब्बतियों के चीन विरोधी रूख को देखते हुए जबर्दस्त सुरक्षा प्रबंध किए गए हैं। अपेक्षा तो यही है कि भारत में रहने वाले तिब्बती अपना प्रदर्शन शांतिपूर्ण ढंग से करंगे। दलाईलामा की सलाह के अनुसार वे हिंसक प्रदर्शन से दूर रहेंगे। वैसे उनका यह विरोध उस ज्येाति का विरोध नहीं है। यह तो तिब्बतियों का रोष प्रदर्शन है, चीन के विरुद्ध उस व्यवहार के लिए, जो चीन तिब्बतियों के साथ कर रहा है। भारत होकर ओलम्पिक ज्योति अब तक दो बार गुजरी है- पहली मर्तबा 1े टोकियो ओलम्पिक के लिए जाते समय और दूसरी बार यह अवसर 40 वर्ष बाद 2004 के एथेंस ओलम्पिक के समय आया था। ओलम्पिक ज्योति को लेकर दौड़ना एक खिलाड़ी के लिए बहुत सम्मान की बात होती है और मेजबान देश के जिस खिलाड़ी को अवसर प्राप्त होता है, ओलम्पिक खेलों के उद्घाटन समारोह में इस मशाल द्वारा स्टेडियम के स्थित अग्निपात्र में ज्योति प्रज्ज्वलित करने का, ये उसके लिए बड़ा सौभाग्य माना जाता है। मशाल लेकर दौड़ने वालों में जो नाम घोषित किए थे, उनमें भारतीय फुटबाल टीम के कप्तान बाई चुंग भूटिया, प्रथम महिला आईपीएस अधिकारी और एशियाई महिला टेनिस चैम्पियन किरण बेदी के नाम भी थे। भूटिया ने तो नाम घोषित होते ही तिब्बतवासियों से अपनी सहानुभूति प्रकट करते हुए इस मशाल दौड़ से अपने को अगल कर लिया था। भारतीय ओलम्पिक और फुटबाल संघ दोनों ने इसे उनका व्यक्ितगत निर्णय बताया। किरण बेदी ने दिल्ली नगर में पुलिस द्वारा बहुत ही सख्त सुरक्षा प्रबंधकों को देखकर इस दौड़ में हिस्सा लेने से मना कर दिया। यह सही भी लगा कि हर खिलाड़ी साफ और खुली हवा में ही दौड़ना पसंद करगा, न कि अनेक बंधनों के बीच। फिल्म अभिनेता आमिर खान का नाम भी एक व्यापारिक प्रतिष्ठान ने घोषित किया है। पिछली बार अनेक फिल्मी कलाकारों को मशाल लेकर दौड़ने का सम्मान दिया गया था, शायद इसलिए कि अधिक से अधिक भीड़ इकट्ठी की जा सके। सदियों पहले ओलम्पिक आंदोलन के जन्मदाता देश यूनान के इन खेलों को एक धार्मिक अनुष्ठान माना जाता था। उन दिनों पूर क्षेत्र में ‘धर्म विश्रान्ति’ घोषित कर दी जाती थी जिससे यदि कहीं कुछ देशों में युद्ध हो रहा हो तो उसे रोक दिया जाता था, जिससे कि भाग लेने वाले देशों के खिलाड़ी निर्भय होकर इन खेलों के लिए पहुंच सकें। इस बार जब इसे राजनीति के विवादों ने घेर लिया है तो इसकी प्रक्रिया पर एक बार फिर विचार करने का मौका आ गया है। बात सिर्फ तिब्बतियों के विरोध की नहीं है। उनकी दिक्कत यह है कि यह ओलंपिक उस समय हो रहे हैं जब दुनिया तिब्बत के लोगों की समस्या को भूलती जा रही है। आधुनिक बनने की कोशिशों में लगा चीन अगर ओलंपिक से पहले ही तिब्बतियों को विश्वास में ले लेता तो शायद यह मौका ही न आता।ड्ढr लेखक प्रसिद्ध खेल समीक्षक व कमेंटेटर हैं

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