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कला का कमाल,आर्डर पर बुक करते माल

खाक से लाख और फिर करोड़ का सफर तय कर रहे रत्नेश राय के करघों पर बने रद्दी कपड़ों के फैन्सी आइटम विदेशों में भी धूम मचा रहे हैं। मां ने सूत काटकर उन्हें पाला तो मेहनत के बूते रोसड़ा के भिरहा निवासी श्री राय ने करघों से ही समृद्धि का सफर तय करने की ठान ली। हुनर ऐसा कि गुदड़ी से ‘मखमली सेज’ सजाने का काम खूब चल निकला। मांग बढ़ी तो आमदनी के साथ-साथ नेम-फेम हुआ। जैसे-तैसे इंटरमीडिएट की शिक्षा पाने वाले श्री राय के बच्चे अब देश के महंगे स्कूलों में पढ़ रहे हैं। घर का लिविंग सिस्टम भी हाई-फाई हो गया। शहर के गुदड़ी बाजार में संगम कारपेट के नाम से जानी जाने वाली संस्था में बनी रंग-बिरंगी दरियां एवं अन्य सामान अमेरिका, कुवैत, युगोस्लाविया, मॉरीशस इत्यादि देशों के अलावा मुंगेर के योगा पीठ एवं अन्य संस्थानों में खूब मांगे जा रहे हैं।ड्ढr ड्ढr इन दिनों कारपेट उद्योग दरियां, एयर बैग, कैरी बैग, लेडीज पर्स, योगा मैट समेत 56 आइटम बनाती है, जिनमें योगा मैट इन दिनों खूब बिक रहा है। लेडीज पर्स की सर्वाधिक मांग कुवैत से हो रही है। पर्स की खासियत यह है कि पॉकेटमारों को इसमें से पैसा उड़ाने में पसीने छूटने लगते हैं। संगम कारपेट में बने पर्स, दरी इत्यादि लालू प्रसाद समेत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, सुशील मोदी सहित कई कद्दावर राजनेताओं के घरों की शोभा बढ़ा रहे हैं। इस संस्था में बने जैकेटों की सराहना जर्मनी से आए व्यवसायी भी कर चुके हैं। हालांकि उनके द्वारा एक लाख जैकेट प्रतिमाह आपूर्ति करने का ऑर्डर श्री राय पूरा न कर सके। उद्योग को बढ़ाने के लिए उन्होंने मुख्यमंत्री को आवेदन दिया है। वर्ष 1में चंडीगढ़ के पेंटेक्स ऊलेन मिल में साधारण कर्मी के रूप में जीवन-यापन की शुरुआत करने वाले श्री राय बताते हैं कि बचपन में उन्होंने अपनी मां स्वर्गीय भक्ित देवी को खादी भंडार में सूत काटते देखा। बचपन से जवानी गरीबी में कटी। तभी से मन में कुछ नया करने की ठानी।ड्ढr ड्ढr किसान घर में जन्मे श्री राय को बचपन में पहली बार चरखे से सूत काटने के लिए शिक्षक रामसुखी चौहान ने पुरस्कृत किया था। उन्होंने बताया कि पेंटेक्स ऊलेन मिल में नौकरी की लेकिन मां के करघों को पुनर्जीवित करने की तमन्ना ने यह काम छोड़ने को विवश कर दिया। 10 में वापस समस्तीपुर लौटे एवं इष्ट मित्रों तथा घर के लोगों के सहयोग से चार करघे खड़े किये। शरुआती दिनों में करघों पर श्री राय के अलावा उनके भाई सुरेश राय ने काम शुरू किया । तब दोनों भाइयों चादर, तकिया खोल इत्यादि बनाने का काम करते थे। लेकिन यह निर्माण बाजार में नहीं चला।

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