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संसद में शहीद-ए-आजम

‘आदमी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मरने के बाद उसके साथ क्या किया जाता है, लेकिन जीवित लोगों को इससे काफी फर्क पड़ता है।’ शहीद-ए-आजम भगत सिंह की प्रतिमा संसद में लगाने को लेकर हुए वाद-विवाद से तीन सदी पहले टामस पेन द्वारा लिखी उक्त पंक्ितयां बरबस याद आ जाती हैं। बहरी ब्रिटिश सरकार को जनता की आवाा सुनाने के लिए भगत सिंह ने 8 अप्रैल, 1ो सेंट्रल असेम्बली हाल में बम फेंका और गिरफ्तारी दी थी। तब उन पर मुकदमा चला और साा हुई। अब उसी संसद परिसर में उनकी 18 फुट ऊंची कांस्य प्रतिमा लगाकर सम्मानित किया जाएगा। यह इतिहास की अनोखी गति है कि जिसे ब्रिटिश साम्राज्य ने राष्ट्रद्रोही करार दिया आज वही देशभक्ित का सिरमौर है। यहां बात प्रतिमा लगाने की नहीं, प्रतिमा की वेशभूषा से जुड़ी है। प्रतिमा लगाने का प्रस्ताव सांसद (अब खेलमंत्री) एमएस गिल और माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मोहम्मद सलीम ने रखा। दोनों ने प्रतिमा का खर्च उठाने का भरोसा दिलाया, जो अच्छी बात है। चकचक तब हुई जब सलीम ने फिरंगी हैट- मूंछ तथा गिल ने पगड़ीधारी भगत सिंह की प्रतिमा बनाने की बात की। भगत सिंह व्यक्ित नहीं, विचार हैं, इसीलिए उन्हें शहीद-ए-आजम माना जाता है। जो आदमी किशोरावस्था में ही भगवान से बागी हो गया हो (उनका लेख- मैं नास्तिक क्यों हूं), जो देश ही नहीं, दुनिया की भी फिक्र करता हो, जो सरकार नहीं व्यवस्था बदलने में भरोसा रखता हो उसे पगड़ी और हैट के विवाद में कैसे घसीटा जा सकता है? भगत सिंह की मौत उनके जीवन से बड़ी बन गई थी। नौजवान पीढ़ी को भगत सिंह का संदेश स्पष्ट था ‘जीवन इतना प्यारा व शांति इतनी मीठी कभी नहीं हो सकती कि उसे गुलामी की कीमत पर खरीदा जाए।’ कुछ माह बाद नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के साथ भगत सिंह भी दिखाई पड़ेंगे। आशा है उनकी प्रतिमा लोकतंत्र के प्रहरियों को देश के लिए कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देती रहेगी।

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