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शोहरत वाली जिन्दगी को मिली गुमनाम मौत

‘हमारी शोहरतों की मौत बे नामों निशां होगी, न कोई तजकिरा होगा न कोई दास्तां होगी’। रुपहले पर्दे की चकाचौंध भरी दुनिया में जीवन के कई दशक गुजारने वाली कुमारी नीना उर्फ जहाँआरा ने शायद ऐसी गुमनाम मौत के बार में नहीं सोचा होगा। बलरामपुर अस्पताल में दो दिनों तक मानसिक सन्तुलन खोते और कई बीमारियों से जूझते हुए बुधवार की सुबह जब उन्होंने दम तोड़ा तो उगता सूरा शायद याद दिला रहा था कि फिल्म जगत की मतलबी दुनिया तो उगते सूरा को ही पूछती है। इस चमक-दमक भर उद्योग के नेपथ्य का अँधेरा उनके जीवन के अन्तिम दिनों को स्याह कर गया था।ड्ढr लगभग दो दशक से हुसैनाबाद में आर्थिक तंगी में गुमनामी भरी जिन्दगी जीते हुए वह मित्रों, प्रशंसकों द्वारा भुला दी गई थीं। फिल्म उद्योग को जानने वालों के लिए किसी फिल्मी हस्ती के जीवन के ये श्वेत-श्याम पक्ष अचरा में डालने वाले नहीं हैं। अधिक दिन नहीं हुए जब नवीन निश्चल के पारिवारिक विवाद से उनके कुण्ठा में दिन गुजारने का पता चला था और परवीन बाबी की रहस्यभरी मौत ने उनके तनाव भर अन्तिम दिनों की जानकारी दी थी। ‘बैजू बावरा’, ‘मिर्जा गालिब’ सहित कितनी ही फिल्मों के प्रसिद्ध नायक भारत भूषण की सरकारी अस्पताल में हुई मौत याद आती है। नादिरा, मुबारक बेगम, टुनटुन जसे कितने ही कलाकारों के आर्थिक तंगी में तनावग्रस्त जीवन जीने की खबरं समय-समय पर आती रही हैं। कुछ वर्षो पूर्व एक चैनल ने बीते दौर के चरित्र अभिनेता को भीख माँगते हुए दिखाया था। नीना उर्फ जहाँआरा ने महा 15 वर्ष की उम्र में ‘मिस चालबाज’ में काम किया था। ‘सपेरा’, ‘तिलस्मी दुनिया’, ‘मुराद’, ‘गोरिल्ला एण्ड टार्जन’, ‘जबक’ उनकी कुछ दूसरी प्रमुख फिल्में थीं जिसमें उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिकाएँ कीं। उनकी माँ रीना देवी उर्फ जोहरा बेगम और मौसी रहाना भी अपने दौर की मशहूर अभिनेत्रियाँ थीं। फिल्म जगत में लम्बा सफर तय करने वाली नीना दो दशक से लखनऊ में थीं। ‘हिन्दुस्तान’ ने गत 2अगस्त 2007 को इस अभिनेत्री पर खबर ‘आज गुमनामी में जी रही हैं अभिनेत्री जहाँआरा’ प्रकाशित की थी।ं

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