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पुरखों की महक लखनऊ खींच लाई मैरिस को

लंदन से आई कैट मैरिस की निगाहें डीाीपी आवास में लगे पुराने आईाीपी और डीाीपी के चित्रों में अपने पड़बाबा विलियम्स सिनक्लेयर के फोटोग्राफ को तलाश रही थीं। कुछ देर में उसके चेहर पर मायूसी छा गई। मैरिस की फोटो यहाँ थी ही नहीं। वह 1में यहाँ के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस थे। यहाँ लगे फोटाग्राफ्स का रकार्ड 1े बाद का है। फिर भी कैट निराश नहीं है..अब वो शुक्रवार को राजभवन जाकर अपने पुरखों की महक को तलाशेगी जहाँ उसके मरहूम परबाबा 1से 1तक बतौर गवर्नर रहते थे।ड्ढr अपराध, पुलिस और राजकाज में उलझे रहने वाले डीाीपी आवास में गुरुवार को कुछ भावुक क्षण नजर आए। खुद डीाीपी विक्रम सिंह, उनकी पत्नी और एडीाी ब्रजलाल ने कैट को पूरा बंगला दिखाया। दरअसल लंदन में एंग्लो-इंडियन आर्ट पर रिसर्च कर रही यह युवती एक बुजुर्ग भारतीय प्रोफेसर वी.सी.पाण्डेय की फिािक्स के प्रति दीवानगी के कारण यहाँ तक आई। फिािक्स प्रो.पाण्डेय का जुनून है। भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर से लेकर जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी यूएसए सरीखे कई विदेशी विश्वविद्यालयों में उन्होंने इस विषय को पढ़ाया है। इसी दौरान उन्हें मरहूम मैरिस के बार में कुछ चौंकाने वाली जानकारियाँ मिलीं। मसलन एक लेखक ने मैरिस के बार में लिखा था कि अगर मैरिस इंडियन सिविल सर्विसेा में चुनकर भारत न जाते तो रदरफोर्ड को स्कॉलरशिप नहीं मिलती। तब वे शायद इतने बड़े वैज्ञानिक नहीं बन पाते। मैरिस और रदरफोर्ड दोनों न्यूजीलैंड के कैंटरबेरी कॉलेज में पढ़ते थे और मैरिस को ज्यादा मेधावी माना जाता था। मैरिस की जीवनी का संपादन कर रहे प्रो.पाण्डेय ने बताया कि यूपी में काफी वक्त गुजारने वाले मैरिस के बार में वे और ज्यादा जानना चाहते थे। उन्होंने मैरिस के परिवार को खोजना शुरू किया तो पता चला कि उनकी पोती व परिवार लंदन में रहता है। प्रो.पाण्डेय ने उनसे सम्पर्क किया और मैरिस के लिखे दस्तावेजों में उन्हें अधूरी आत्मकथा लखनऊ व आजमगढ़ के कुछ फोटोग्राफ व कई अन्य दस्तावेज मिले। अलीगंज के सेक्टर जे में रहने वाले बुजुर्ग प्रो.पाण्डेय के घर में रुकी कैट मैरिस के लिए सबकुछ सपनों जसा है।

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