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दो टूक

एक दशक पूर्व तक चुनावी सभाएं पार्टी की नीति-उपलब्धियों के बखान का मंच हुआ करती थीं, जहां कद्दावर नेता अपने अनुभव, बौद्धिकता और परंपरागत शैली में अपने समर्थकों को मोह लिया करते थे। उनका चेहरा चमकता था। धूप-बरसात में मीलों दूर से लोग उनका भाषण सुनने आते थे। अब इनकी जुबान को क्या हो गया है? अब इनके मुखारविंद से निकलता है- हाथ काट देंगे, रोलर चलवा देंगे, वो पूतना हैं, वे जल्लाद हैं। जो वोट नहीं देगा, उसका हाथ काट देंगे-ऐसे अनेक ओछे संबोधन और धमकियां। यह हाल क्षेत्रीय-राष्ट्रीय सभी दलों के नेताओं का है। चुनावी वैतरणी पार करने का सपना देखनेवाले ऐसे माननीयों की औकात तो जनता बतायेगी, पर जुबान का यह स्तर बताता है कि लोकतंत्र के इन पहरुओं के संस्कार में खोट जरूर है।

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