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सारण में स्कूल नहीं जाते बाल श्रमिक

नाम-अनिल और अजरुन, उम्र लगभग 6 से 7 वर्ष, पिता क्रमश: मिठाई डोम और नगीना बांसफोर। पेशा पूर दिन कूड़े-कचड़े के ढेर से या विभिन्न गलियों में कागज, जूते-चप्पल, प्लास्टिक आदि चुनना। उम्र पढ़ने की पर फिक्र पेट की। वजह गरीब मां-बाप पढ़ाने व पर्याप्त भोजन देने में विफल। कमाई प्रतिदिन 20-25 से 50 रुपए तक। दोनों साथ घूमते हैं पर कभी-कभी एक ही वस्तु पर दावा जताने के दौरान कूड़े के ढेर पर ही झगड़ भी पड़ते हैं। इनके लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तकनीकी टीम द्वारा सव्रेक्षण के बाद सरण जिले में खुले 77 बाल श्रमिक विद्यालय कोई मायने नहीं रखते।ड्ढr ड्ढr यह अलग बात है कि इन स्कूलों को शहर से ग्रमीण स्तर तक प्रति विद्यालय प्रति वर्ष 2 लाख 44 हाार अनुदान पर 38 एनजीओ के माध्यम से चलाए जाने का दावा जिला प्रशासन करता है। सव्रेक्षण में जिले में बाल श्रमिकों की संख्या 1हाार दिखाई गई है जिन्हें विद्यालय में नामांकन के बाद प्रतिमाह एक सौ रुपए प्रोत्साहन राशि देना है। बावजूद आज भी वास्तविक बाल श्रमिक कूड़े-कचड़े के ढेर पर, होटल या गैराजों में कठिन परिश्रम कर अपना भविष्य तलाशते नजर आ रहे हैं। हालांकि इन पर रोक लगाने वाले श्रम विभाग के अधिकारी कुछ व्यावसायिक घरानों में बाल श्रमिकों को पकड़ने के नाम पर छापा जरूर मारते हैं, परन्तु इन्हें स्टेशन सड़कों, होटलों, गैराजों, पदाधिकारियों-कर्मचारियों के घरों पर काम कर रहे बाल श्रमिक नहीं दिखते हैं। जमीनी हकीकत यह है कि इनके नाम पर खुले विद्यालयों में कई तो कागज पर चलते हैं, उनमें भी मानदेय के लाभ की वजह से कुछ वैसे बच्चे पढ़ते हैं जो वास्तव में बाल श्रमिक नहीं हैं। वहीं इस संबंध में पूछे जाने पर सामाजिक सुरक्षा कोषांग के उपनिदेशक अमरनाथ मिश्र बताते हैं कि उम्मीद से ज्यादा बाल श्रमिक इन विद्यालयों में नामांकित हैं। यदि बाल श्रमिक के बदले दूसर बच्चे पढ़ते हैं और इस संबंध में कोई शिकायत मिलती है तो इसकी जांच कराई जायेगी।ड्ढr ड्ढr बहरहाल, प्रशासन जो भी दावा कर सच्चाई यह है कि बाल श्रमिक सव्रेक्षण के बाद भी जिले में कई ऐसे बाल श्रमिक रह गए हैं जो अब तक स्कूल का मुंह नहीं देख पाए हैं।

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