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राजरंग

नेता जी समझिये नहीं पा रहे कि दिल का हाल किसको सुनायें। ठीक है कि लोगों का दुख-दर्द देखना उनके जिम्मे है, पर उनका हाल सुनने वाला भी तो कोई चाहिए न! लग तो यही रहा है कि जसे नेता बनकर कोई बड़ा गुनाह कर दिया हो। बात-बात पर बदनामी होती है। घर-परिवार के लिए कुछ कर दिया, तो लोगों को बर्दाश्त नहीं होता। परिवार का कोई राजनीति में आ जाये, तो पार्टी से लेकर पब्लिक तक में हल्ला। बेटा-भाई नहीं पढ़े, तब भी सुनना नेताजी को ही पड़ता है। जितने मुंह उतनी बात : उड़ा ले मौज बबुआ। का चीज का कमी है। गाड़ी, घोड़ा, जमीन-ाायदाद, बैंक बैलेंस सब कुछ तो हइये है। नेताजी तो सात पीढ़ियों का इंतजाम कर ही दिये हैं।.. घर-परिवार में कोई साहब-उहब बन गया, तो भी आफत है। उसकी कहीं ठीक-ठाक पोस्टिंग हो गयी, तब तो और मुसीबत।.. बाल-बच्चों को पढ़ने -पढ़ाने पर जोर देना गुनाह तो नहीं। पर नेता जी ने कहीं लग्गी लगा दी और बात बन गयी, तब भी कम किचकिच नहीं।.. छोटका बबुआ, साहब बना, बड़ा बाबू पर उंगली उठने लगी। कुछ बोलते नहीं बनता। कुनमुना कर रह जाते हैं। छोटका की मेहनत का कोई मोल नहीं। अब देखिये भाई, ई जो अपना स्टेट है इसमें बड़का-बड़का गेम होता है। जौ के साथ घुन भी पिस जाता है। नेता जी जिस राह चलें उंगली उठ जाती है। पर टेंशन नहीं लेना है।.. जन सेवा की राह में सब बर्दाश्त करना है।

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