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मशाल और सवाल

अगर भारत सरकार का उद्देश्य भारत में ओलंपिक मशाल की सिर्फ भौतिक सुरक्षा नहीं, ओलंपिक भावना और उसके सम्मान की रक्षा भी था, तो दिल्ली में असाधारण सुरक्षा इंतजामों ने इस उद्देश्य को विफल कर दिया। एक लोकतांत्रिक समाज और राज्य की राजधानी के केन्द्रीय इलाके को फौाी छावनी में तब्दील करके सरकार ने ओलंपिक भावना को मजबूत तो नहीं ही किया है। विभिन्न सुरक्षा बलों के सतरह हाार जवान सिर्फ 2.3 किलोमीटर की मशाल यात्रा के लिए तैनान थे। दूर दूर तक के तमाम दफ्तरों की छुट्टी कर दी गई थी। तमाम नागरिक लंबे लंबे ट्रैफिक जामों में फंसे हुए थे। यह सब करके भारत सरकार किसे खुश करना चाहती थी? क्या चीन सरकार को खुश करना हमार लिए इतना जरूरी है कि उसके लिए हम अपने लोकतांत्रिक तौर-तरीके ताक पर रख दें, ऐसी सुरक्षा तो हमार राष्ट्रीय पर्वो पर नहीं होती। यह देखा गया है कि भारत में तिब्बत समर्थक और चीन विरोधी प्रदर्शनों से चीन की भावनाएं आहत न हों, इसके लिए भारत सरकार कुछ ज्यादा ही संवेदनशील रहती है। यह अच्छा राजनय भी नहीं है, क्योंकि जरूरत से ज्यादा झुकने से कभी भी सम्मान हासिल नहीं होता। अगर हम चीन को यह जता सकें कि हम एक लोकतांत्रिक देश हैं और इसलिए लोकतांत्रिक मूल्यों और मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं कर सकते, तो हमारा सम्मान दुनिया में बढ़ेगा। एक संप्रभु देश के लिए अपने नागरिकों की सुविधा और सम्मान सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होना चाहिए। बहरहाल, दलाई लामा और तिब्बत के लोगों के प्रति आम भारतीय मन में लगाव है, वह लगाव इस प्रसंग के बाद बढ़ा ही होगा। इस मायने में तिब्बत समर्थकों की जीत हुई है। सरकार के अतिवादी रवैए ने वह कर दिया जो उनके प्रदर्शन करने से नहीं हासिल होता। अपने ही देश के नागरिकों और मशाल के बीच अविश्वास की इतनी चौड़ी दीवार खड़ी करके ओलंपिक भावना की रक्षा नहीं हो सकती।ं

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  • Web Title: मशाल और सवाल