अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

नेपाली माओवादियों से खौफ कैसा?

नेपाल में संविधान परिषद् के प्रारंभिक चुनाव परिणामों से ही स्पष्ट है कि नेपाली साम्यवादी दल (माओवादी) को विधान परिषद् में स्पष्ट बहुमत हासिल होगा। यह परिणाम नेपालियों के लिए भी प्रत्याशित है। भारत के कई वर्ग इस चुनाव-परिणाम से चकित और हताश हैं। उनका अनुमान है कि नेपाली राजनीति में माओवादियों को प्रभुत्व नेपाल और भारत दोनों के लिए खतर की घंटी है। इन भविष्यवक्ताओं का कहना है कि माओवादियों का संविधान परिषद और सरकार में बहुमत होने से संसदीय प्रजातंत्र की समाप्ति की शुरुआत होगी। अन्य राजनैतिक दल एक-एक कर हाशिए पर डाल दिए जाएंगे और प्रजातंत्र के नाम पर एकदलीय तानाशाही स्थापित हो जाएगी। माओवादी तानाशाही। इसके अलावा, माओवादी नेपाली सेना को अपने संवर्गो से भर देंगे और उसके ऊपर पूरी तरह हावी हो जाएंगे। इसके चलते माओवादियों के खिलाफ कोई सर भी उठा नहीं पाएगा। साथ ही नेपाल में पूंजीवाद का नामोनिशान मिट जाएगा और उसकी जगह पर कम्यून-संचालित अर्थव्यवस्था कायम होगी। इतना ही नहीं, माओवादियों द्वारा साम्यवादी सिद्धांतों को लादने की प्रक्रिया में नेपाली राष्ट्रीयता को आघात पहुंचेगा। इन निराशावादियों पर विश्वास करं तो, विदेश नीति में माओवादी भारत विरोधी रुख अपनाएंगे, जिसके चलते नेपाल में भारत का प्रभाव क्षीण हो जाएगा और शीघ्र ही नेपाल चीन का एक अनुचर-राष्ट्र बन जाएगा, जिससे नेपाल का भारत और चीन के बीच के प्रतिरोधक राज्य का स्वरूप बदल जाएगा। फिर भारत-चीन की सीमा रखा सैकड़ों मील खिसककर उत्तर प्रदेश और बिहार तक पहुंच जाएगी। भारत की बाह्य सुरक्षा खतर में पड़ जाएगी। माओवादियों के सत्तारुढ़ होने से भारत में नक्सलवादियों की गतिविधि में वृद्धि होगी, जिसका भारत की आंतरिक सुरक्षा पर प्रतिकूल असर होगा। आर्थिक क्षेत्र में नेपाल में भारत का प्रभाव कम होता जाएगा। माओवादी भारतीय पूंजीनिवेश पर आधारित कंपनियों का राष्ट्रीयकरण कर भारतीय कंपनियों की गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा देंगे।ड्ढr पर यह स्मरण रहे कि नेपाल में प्रजातांत्रिक क्रांति न तो माओवादियों की लाई हुई है और न सात-दलीय गठबंधन की। यह क्रांति जनांदोलन से आई है। इसीलिए कोई भी दल संविधान परिषद की कार्यवाही में या राज्य के पुनर्निमाण की प्रक्रिया में जनता की भावनाओं और अपेक्षाओं की अवहेलना नहीं कर पाएगा। यह दल जो कुछ भी करंगे, उसपर जनता की कड़ी निगाह होगी। यह अपेक्षा बहुत हद तक 15 जनवरी 2007 में लागू अंतरिम संविधान में शामिल हो चुकी है। इसके प्रमुख तत्व हैं: बहुदलीय प्रजातंत्र, बुनियादी अधिकार, स्वतंत्र न्यायपालिका और संघीय राज्य प्रणाली। ये सिद्धांत संविधान के अभिन्न अंग बन चुके हैं और विवाद के पर हैं। माओवादियों के लिए इनको बदलना असंभव ही होगा। अगर उन्होंने ऐसा करने का प्रयास किया तो नेपाल की राज्य व्यवस्था पुन: अस्त-व्यस्त और अस्थिर हो जाएगी। समावेशी प्रजातंत्र के लिए इतनी दूरी तय करने के बाद माओवादियों के लिए सशस्त्र क्रांति की स्थिति में वापस जाना काफी कठिन होगा। प्रजातंत्र का आलिंगन उनके लिए एक बाघ पर सवार होने के बराबर हो गया है। इस सवारी पर चलते रहने में ही सुरक्षा है। अगर किसी ने कोई अन्य हरकत की तो वह बाघ का शिकार बन सकता है। और अगर माओवादियों को प्रजातंत्र के मार्ग पर ही चलना है तो उन्हें संविधान निर्माण के बाद होने वाले चुनावों की भी चिंता होनी चाहिए। इसीलिए वे प्रजातंत्र पर किसी भी प्रकार प्रहार करने से घबराएंगे। दूसरी बात यह है कि माओवादियों के बहुमत के बावजूद भी संविधान परिषद विविधतापूर्ण होगी। उसमें न केवल नेपाली कांग्रेस और यूएमएल के सदस्य होंगे, बल्कि अनेक मधेशी और स्वीकृति प्राप्त हर उपजाति के एक-एक सदस्य। ऐसी संविधान परिषद में माओवादियों की मनमानी नहीं चलेगी। एक प्रकार से, विधान परिषद् में एक न्यूनतम सम्मानजनक संख्या में उपस्थित रहने के लिए और किसी भी दल की मनमानी को रोकने के लिए जिन प्रावधानों को (समानुपातिक मतों पर आधारित सदस्यों का चुनाव एवं सर्व सम्मति या दो-तिहाई से निर्णय) माओवादियों ने अंतरिम संविधान में शामिल कराया, अब वे ही इनके पैरों में जंजीर का काम करंगे। आज की दुनिया में कोई भी साम्यवादी दल अपने देश में कम्यून-संचालित या ट्रौटस्की के विनाशकारी समाजवाद को पुनस्र्थापित करने की चेष्टा नहीं करता है। क्योंकि ऐसा समाजवाद इतिहास के एक ध्वंसावशेष के रूप में रह गया है। यह समाजवाद न तो रूस में है न क्यूबा में या नेपाल के नजदीक चीन में। इन सार देशों में अब मुक्त बाजार की शक्ितयों से पूरा लाभ उठाकर, पूंजीवाद के माध्यम से समाजवाद की स्थापना की कोशिश चल रही है। नेपाल के माओवादी नेता काफी पढ़े लिखे और आधुनिक ख्याल के हैं। वे दुनिया के इन परिवर्तनों को नजरंदाज नहीं कर सकते। साथ वे यह भी समझते होंगे कि नेपाल भूमंडलीयकरण और उदारीकरण की लहरों से अछूता नहीं रह सकता। यह धारणा भी भ्रामक है कि माओवादियों के सत्तारुढ़ होने से नेपाल चीन की गिरफ्त में आ जाएगा और वहां भारत का प्रभाव क्षीण हो जाएगा। भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीति के दृष्टिकोण से नेपाल दक्षिण एशिया का अंग है। भौगेलिक बाध्यताओं के कारण भारत पर नेपाल की बहुआयामी निर्भरता रही है- व्यापार, व्यापार-मार्ग, पेट्रोलियम एवं खाद्यान्न जसे अत्यावश्यक सामग्रियों की पूर्ति के लिए। इतना ही नहीं बल्कि नेपाल की राष्ट्रीय आय का एक बहुत बड़ा अंश भारतीय पर्यटकों और भारत में रह रहे नेपालियों के पैसे का होता है। नेपालियों की आर्थिक समृद्धि वहां की जल सम्पदा के विकास से ही होगी जो कि भारत के सहयोग के बिना संभव नहीं है। भारत भी कई तरह से नेपाल पर निर्भर है। ऐसे किसी भी क्षेत्र में चीन भारत का स्थान नहीं ले सकता। यह चीन और नेपाल देानों के लिए बहुत महंगा पड़ेगा। और कुछ चीजें तो भौगोलिक दृष्टिकोण से नितांत असंभव हैं। और अंत में यह भी याद रहे कि नेपाल हमेशा एक स्वतंत्र राष्ट्र रहा है। नेपालियों में राष्ट्रीयता कूट-कूट कर भरी हुई है। वे किसी भी सरकार को ऐसा कदम उठाने न देंगे जिससे उसकी राष्ट्रीय पहचान पर आघात पहुंचे। नेपाली चुनावों के नतीजे से भारत में आशंका के बदले हर्ष होना चाहिए। यह बहुत बड़ी बात है कि इतनी बाधाओं के बावजूद नेपाल के ये चुनाव लगभग शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुई। यह माओवादियों की जीत से बढ़कर नेपाली जनता की जीत है।ं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: नेपाली माओवादियों से खौफ कैसा?