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किचचसान कचचो कचचर्ज माफचची नहीं, उचित दाम चाहिए

गरीब राज्यों के दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले छोटे किसानों की सचमुच कोई जरूरत है तो वह है सही समय पर कर्ज और उसकी उपज के लिए बाजार और उचित दाम। तीसरे उपाय के तौर पर फसल बीमा प्रणाली मजबूत बनाकर छोटे किसान की बेहतर मदद की जा सकती है। एनसीएईआर की ताजा रिपोर्ट में यह निष्कर्ष बताया गया है। आर्थिक परिदृश्य का बारीकी से विश्लेषण करने वाले गैर-सरकारी संस्था नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लायड इकनोमिक रिसर्च (एनसीएईआर) ने मैक्रोट्रेक के ताजा अंक में वित्त मंत्री पी चिदंबरम द्वारा इस साल के बजट में किसानों के लिए घोषित 60,000 करोड़ रुपए की कर्जमाफी घोषणा की पड़ताल करते हुए यह बात कही है। उसके मुताबिक विशेषकर छोटे किसानों के साथ कई समस्याएं जुड़ी हैं। इसमें कहा गया है कि सूखाग्रस्त क्षेत्रों में रह रहे छोटे किसानों की पहुंच बैंकों तक कम और महाजनों तक ज्यादा है। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सहकारी बैंक और वाणिज्यिक बैंक जैसे औपचारिक संस्थानों से कृषि ऋण का प्रवाह केवल धनी राज्यों के किसानों तक ही ज्यादा है, क्योंकि इन राज्यों में बैंकिंग तंत्र मजबूत और व्यापक है, जबकि पूर्वोत्तर और मध्य भारत के राज्यों में यह इतना व्यापक नहीं है। राष्ट्रीय कृषि आयोग (एनसीए) का हवाला देते हुए इसमें कहा गया है कि आयोग ने किसानों को निम्न ब्याज दर पर कर्ज देने की सिफारिश की है लेकिन अनुभव यह बताता है कि गारंटी और रहन के अभाव में छोटे और सीमांत किसान बैंकों में जाने के बजाय मजबूरन महाजन और सूदखोरों का रुख करते हैं। रिपोर्ट में साफ तौर पर टिप्पणी की गई है कि सरकारी बैंक बेशक यह दर्शाते हों कि कृषि ऋण 2005-06 में 1,80,000 करोड़ रुपए से बढ़ता हुआ 2007-08 में 2,24,000 करोड़ रुपए तक पहुंच गया लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि इसका फायदा किसको मिला। क्या छोटे किसानों को इसका लाभ मिल पाया है?

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