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दम निकले तो कथक करते हुए : शोभना

नामचीन कथक नृत्यांगना पद्मश्री शोभना नारायण की तमन्ना है कि आखिरी दम तक वह नाचती रहें। उनके लिए कथक ही जीवन है। ढाई साल की उम्र से उनकी शुरू हुई नृत्य यात्रा अब तक जारी है। 1बैच की एलायड अधिकारी शोभना जी ने ढाई साल की उम्र में ही बिहार छोड़ दिया था पर लगाव कम नहीं हुआ है। वह कहती हैं कि उन्हें जब भी बिहार से बुलाया जाता है भागती हुई आती हैं। दुर्गापूजा के मौके पर कई बार पटना में कथक कर चुकी हैं। कुछ सालों पूर्व सूबे की सांस्कृतिक नीति तैयार करने में सहयोग किया। श्रीमती नारायण ने रविवार को ‘हिन्दुस्तान’ से विशेष बातचीत करते हुए कहा कि देश-विदेशों में उन्होंने ढेरों कार्यक्रम किए हैं। उनके लिहाज से सार कार्यक्रम काफी खूबसूरत थे। लेकिन सन् 82 में रूस में एक कार्यक्रम की उन्हें अब भी याद है। उनका नृत्य खत्म होने पर पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा व एक व्यक्ित भागता हुआ उनके पास आकर पैरों पर फूलों की बारिश कर दी।ड्ढr ड्ढr स्व.मधुरिता सारंग की समकालीन व उमा शर्मा से जूनियर शोभना जी ने कथक की शुरुआती शिक्षा कोलकाता में साधना बोस से , मुंबई में कुंदनलाल से व दिल्ली में कथक सम्राट बिरजू महाराज से पायी। वह अभी चालीस से पचास बच्चों को अपने घर में स्थित अकादमी में कथक की शिक्षा दे रही हैं। उनकी राय में फिलहाल देश में कथक नृत्य का परिदृश्य बहुत बढ़िया है। कथक सीखने वाले बच्चों की अच्छी तादाद है। नए बच्चों में लगन व समर्पण की कमी नहीं है। उनका पुत्र फुटबॉल व पढ़ाई में बहुत अच्छा है। सन.में पद्मश्री से सम्मानित शोभना कहती हैं कि अपने लोगों से सम्मानित व प्यार पाना बहुत अच्छा लगा। वह एक टीवी फिल्म व जर्मन फिल्म में भी अभिनय कर चुकी हैं।

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