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जनता दरबार में भी नहीं मिला न्याय

‘अब किस दरबार में जाऊं। मुख्यमंत्री के जनता दरबार में पांच बार गया। स्वास्थ्य सचिव के यहां आठ बार। निदेशक प्रमुख और अपर निदेशक के यहां भी चार-चार बार। स्वास्थ्य मंत्री से लेकर लोकायुक्त तक गुहार लगाई। जहां तीन दशक तक लगातार सेवा की, वहीं के अधिकारी और कर्मी ‘पेंशन’ की पूरी राशि देने के लिए ‘सुविधा शुल्क’ मांग रहे हैं। ’ड्ढr यह कहते हुए फरवरी 2003 में ‘अचिकित्सा सहायक’ के पद से रिटायर हुए दलित वर्ग के रामनरश चौधरी फफक पड़े। चौधरी की मानें तो वे इकलौते नहीं हैं बल्कि उनकी तरह सैकड़ों हैं जिनकी जनता दरबार में दौड़ लगाने पर भी सुनवाई नहीं हो रही। उन्होंने आपबीती सुनायी।ड्ढr ड्ढr आवेदनों की रिसीविंग की झड़ी लगा दी। उन्होंने वर्तमान और पिछली सरकारों की असली तस्वीर भी रखी। उन्होंने कहा-पिछली सरकार के समय तो मुख्यमंत्री के यहां जाने की हिम्मत ही नहीं थी। इस शासन में मिलने का अधिकार मिला है। पूरी जिन्दगी ईमानदारी से काम करने का दावा करने वाले श्री चौधरी ने बताया कि रिटायर होने के करीब डेढ़ वर्ष बाद कड़क अधिकारी सीके अनिल की पहल पर सेवांत लाभ का भुगतान हुआ पर सुनिश्चित वृत्ति उन्नयन योजना (एसीपी) का लाभ अब तक नहीं मिला है। अधिकारियों की मनमर्जी के सताए चौधरी जैसे सैकड़ों लाचार सरकारी कार्यालयों में रोज मिल जाएंगे। श्री चौधरी ने बताया- दुखद स्थिति यह है कि मुख्यमंत्री के जनता दरबार में चेहर पर मुस्कुराहट लिये हर काम को पूरा करने की दुहाई देने वाले अधिकारी वहां से हटते ही पुराने रंग में आ जाते हैं। जनता दरबार के हरा कार्ड की धमक विभाग में आते ही समाप्त हो जाती है। ऐसा नहीं होता तो पांच-पांच हरा कार्ड लेकर मैं सड़क पर नहीं घूमता।ड्ढr श्री चौधरी ने सवाल किया कि जनता दरबार में दोबारा नहीं आने की चेतावनी देने वाले अधिकारी एक ही बार में सुनवाई क्यों नहीं करते हैं, यह मुख्यमंत्री को आखिर कैसे बताया जाए?

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