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19 फरवरी, 2020|2:27|IST

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बीमारी और बेचैनी

खबर है कि स्वाइन फ्लू या एच1एन1 वायरस के संक्रमण से देश में 650 से ज्यादा लोग मर गए हैं और इसके मरीजों की तादाद 10,000 से ऊपर चली गई है। इस बुखार को ‘स्वाइन फ्लू’ कहना गलत है, क्योंकि वास्तव में इसका वायरस आम इंसानी फ्लू का वायरस है, जिसने स्वाइन फ्लू के वायरस से कुछ जीन्स ले लिए हैं, लेकिन यही नाम प्रचलित हो गया है, जिससे कुछ नुकसान सूअरों का हुआ, क्योंकि जब इस बीमारी की शुरुआत हुई थी, तब घबराहट में कई जगह सूअरों को मार डाला गया था, जबकि इसके फैलने में सूअरों का कोई योगदान नहीं है। यह वायरस 2009 में बड़े जोर-शोर से फैला था, उसके बाद एकाध साल काफी चर्चा में रहने के बाद कुछ वक्त तक दबा रहा। इस साल यह फिर तेजी से फैल रहा है। बीमारियों के नियंत्रित हो जाने या तेजी से फैलने के पीछे इतने जटिल कारण होते हैं कि अक्सर उन्हें ढूंढ़ना भी मुश्किल होता है। फ्लू जैसी बीमारियों के साथ यह जरूर होता है कि वक्त के साथ इंसानी शरीर उनके प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेता है और धीरे-धीरे रोग की तीव्रता घट जाती है, लेकिन यह प्रक्रिया उतार-चढ़ाव के साथ होती है। फिर कुछ एक सालों बाद वायरस अपनी जैविक संरचना में कुछ फर्क पैदा करके नए सिरे से आक्रमण करता है।

देश की सवा सौ करोड़ की आबादी में फ्लू जैसी बीमारी के 10,000 मरीज कोई ज्यादा नहीं हैं और मरने वालों की तादाद भी इतनी नहीं है कि उस पर आशंकित हुआ जाए। लेकिन इस बीमारी का फैलाव जिस तरह से हो रहा है, उससे हमारी सार्वजनिक चिकित्सा प्रणाली की कमियां उजागर हो रही हैं और दहशत फैल रही है। पहली समस्या तो यह है कि हमारे यहां सार्वजनिक चिकित्सा का व्यवस्थित तंत्र नहीं है और ज्यादातर आबादी निजी चिकित्सकों पर निर्भर है। निजी स्वास्थ्य तंत्र का नियमन करने वाली कोई व्यवस्था नहीं है, इसलिए यह भी देखा गया कि निजी प्रयोगशालाएं स्वाइन फ्लू की जांच के मनमाने पैसे वसूल कर रही हैं। ये भी खबरें आ रही हैं कि स्वाइन फ्लू में इस्तेमाल होने वाली दवा ‘टैमिफ्लू’ की कालाबाजारी हो रही है। इसके पहले एक खबर यह आई थी कि कुछ प्रयोगशालाओं ने स्वाइन फ्लू की हजारों वैक्सीन नष्ट कर दिए, क्योंकि उन्हें सरकार ने खरीदा नहीं। स्वाइन फ्लू जब पहली बार आया था, उसके बाद उसके लिए दो वैक्सीन विकसित किए गए थे। पिछले सालों में स्वाइन फ्लू का प्रकोप खास नहीं था, इसलिए स्वास्थ्य तंत्र की दिलचस्पी इसमें कम हो गई और अब प्रकोप बढ़ने पर इसका कोई इंतजाम नहीं है। जरूरी यह था कि स्वाइन फ्लू के प्रकोप के लिए लगातार तैयारी बनाए रखी जाए, क्योंकि इसका कम-ज्यादा असर अगले कुछ साल तक बना रहेगा। जब लोगों का लगता है कि बीमारी से निपटने की तैयारी नहीं है, तो घबराहट से स्थिति ज्यादा बिगड़ जाती है।

पिछले कुछ सालों से मौसम भी इतना अनियमित हो गया है कि उससे इस तरह की बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। मौसम को नियंत्रित करना तो मुमकिन नहीं है, लेकिन बीमारियों से बचने के उपाय तो किए जा सकते हैं। सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत किया जाए। निजी क्षेत्र बीमारी होने पर इलाज तो कर सकता है, लेकिन बीमारियों का व्यापक बचाव सिर्फ सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था ही कर सकती है। भारत में बढ़ता हुआ वायु व जल प्रदूषण कई संक्रामक बीमारियों के फैलने के लिए अनुकूल वातावरण पैदा कर रहा है। अभी ऐसी हालत नहीं है कि घबराया जाए, लेकिन हमें भविष्य के लिए बेहतर तैयारी रखने की जरूरत है।

 

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