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यह बीमारी है, महामारी नहीं

अचानक स्वाइन फ्लू को लेकर देश भर में जो कोलाहल और हंगामा मच उठा है, उसमें यह समझने की जरूरत है कि यह महामारी नहीं है, इसलिए घबराने की बात भी नहीं है। दरअसल, जब भी फ्लू के वायरस का कोई स्ट्रेन शुरू होता है, तो उसके मामले कभी ज्यादा, तो कभी कम हो जाते हैं। साल 2009 में यह पैनडेमिक फ्लू (एच1एन1 फ्लू वायरस) आया, तब यह नया-नया था, इसलिए दुनिया भर में इसके अधिक मामले देखे गए। इसके बाद से यह धीरे-धीरे मौसमी फ्लू के रूप में ‘सेटल’ होता जा रहा है। इसे पूरी तरह स्थापित होने में कुछ और साल लगेंगे। आम तौर पर किसी भी नए फ्लू को स्थापित होने में पांच या उससे अधिक साल लग ही जाते हैं, क्योंकि एक तरफ तो इसके बारे में जानकारियां और संकेत स्पष्ट हो जाते हैं, तो दूसरी तरफ, मानव शरीर के प्रतिरोधी-तंत्र का स्तर भी इसी के अनुसार बढ़ने लगता है। हालांकि इन वर्षों में इसके मामलों को लेकर उतार-चढ़ाव की स्थिति बनी रहती है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि इस साल मामले अधिक हैं, तो अगले साल कम ही होंगे। भारत में साल 2010 में इसकी चपेट में अधिक लोग आए थे। साल 2012 में यह शांत रहा, फिर अगले साल यानी 2013 में कुछ ज्यादा मामले उठे। लेकिन पिछले साल इसके कम मामले सामने आए, और इस वर्ष इसके मामले एक बार फिर ज्यादा हो गए हैं।

वैसे, खबरों के शोरगुल में इस तथ्य को अच्छी तरह से समझने की जरूरत है कि इसमें महामारी जैसा कुछ भी नहीं है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में ऐसी स्थितियां आती रहती हैं, जब कुछ मामलों के बाद सब चीजों में उसी खतरे को देखा जाता है। अचानक अस्पतालों में भीड़ बढ़ जाती है और यह कहा-सुना जाने लगता है कि ‘इस’ या ‘उस’ रोग का इलाज मुश्किल है, इसलिए ज्यादा जानें जाएंगी। सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में कितने बीमार हुए और उनमें से कितने मरे, उस आधार पर भयावहता का अंदाज लगाना अपेक्षाकृत गलत तरीका है। हकीकत यह है कि मौतें सिर्फ बीमारी पर निर्भर नहीं करतीं, बल्कि उस बीमारी के खिलाफ हमारी कैसी तैयारी है, इस बात पर भी निर्भर करती हैं।

इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। बीते वर्ष इबोला वायरस के कहर को लेकर दुनिया भर में काफी  हो-हल्ला मचा था। अफ्रीकी देशों में इबोला वायरस से काफी जानें गईं, लेकिन अमेरिका में इसका प्रसार बहुत नहीं देखा गया। वहां दो-चार बदकिस्मत इसकी चपेट में आए। इसी तरह, स्वाइन फ्लू के मामलों को स्थानीय स्तर पर देखें, तो दिल्ली की तुलना में राजस्थान, गुजरात और लखनऊ में स्वाइन फ्लू से मरने वालों की तादाद अधिक है। इसलिए इस नतीजे पर पहुंचना गलत होगा कि स्वाइन फ्लू के विषाणु तेजी से फैल रहे हैं और इस पर काबू नहीं पाया जा सकता। केंद्र सरकार का भी यही रुख है कि स्थिति बेकाबू नहीं हुई है और इसलिए दहशत में आने की कोई जरूरत नहीं है।

मौसमी इनफ्लुएंजा के संदर्भ में अमेरिका जैसे विकसित देश की तरफ देखने की जरूरत है, जहां इससे सैकड़ों लोग हर साल मर जाते हैं। लेकिन हमारे देश में अभी तक इस तरफ देखा भी नहीं जा रहा था। अचानक से स्वाइन फ्लू का मामला उठा, तो कई ‘माइल्ड सिम्प्टम केसेस’ भी प्रकाश में आ गए। ऐसे समय में, जब लोगों की जागरूकता अपनी सेहत को लेकर बढ़ी हुई है, तब यह जानना चाहिए कि स्वस्थ वयस्कों में इनफ्लुएंजा से बहुत घातक असर के खतरे कम ही होते हैं।

स्वाइन फ्लू के इलाज और बचाव का तरीका मौजूद है। इसमें कारगर दवा टैमीफ्लू भी हमारे पास उपलब्ध है। यह कहा जा रहा है कि सरकार ने साल 2014-15 के बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र में आवंटित रकम में 20 फीसदी की कटौती कर दी, इसलिए इस विषाणु को फैलने से रोकने में दिक्कतें आ रही हैं। लेकिन पूरी स्थिति ऐसी नहीं है। दवाओं का स्टॉक और वितरण एक मुद्दा तो है ही, लेकिन अफरा-तफरी के बीच जब तक इस रोग के लक्षण स्पष्ट न हो जाएं, बल्कि शरीर में एच1एन1 विषाणु की मौजूदगी के गंभीर लक्षण न दिखें, तब तक टैमीफ्लू जैसी दवा मरीज को नहीं दी जा सकती। जरा सोचिए कि ‘माइल्ड’ लक्षण में अगर यह दवा दे दी जाए, तो क्या स्थिति पैदा होगी? आम फ्लू में ही मरीज इस शंका के कारण टैमीफ्लू खाने लगेगा कि उसे स्वाइन फ्लू हो गया है, तो इलाज के क्षेत्र में इसका एक बुरा असर यह पड़ेगा कि एच1एन1 वायरस को प्रतिरोध का मौका अधिक मिल सकता है। भारत की विशाल आबादी के हिसाब से भी यह स्थिति उपयुक्त नहीं होगी कि सभी मरीजों को यह दवा खिलाई जाए।

यहां कई चीजों को तय करना जरूरी है कि कब अस्पताल जाना है, कब दवा लेनी है, कब जांच करानी है और किसको टीका लेना है? अस्थमा से बीमार व्यक्तियों, दिल के मरीजों, गर्भवती महिलाओं, छोटे बच्चों और बुजुर्गों में इनफ्लुएंजा से जुड़ी शारीरिक परेशानियां आ सकती हैं, क्योंकि ये ‘हाई रिस्क ग्रुप’ में होते हैं। इन लोगों में फ्लू की पहचान जरूरी है। उसके लक्षणों को जानना चाहिए और उनका उपचार किया जाना चाहिए। जरूरत पड़ने पर ही टीकाकरण की व्यवस्था हो। चूंकि यह एक सीजनल फ्लू बन चुका है, तो यह भी जानना जरूरी है कि सीजनल फ्लू के वायरस में हर साल तब्दीलियां आती रहती हैं, इसलिए इसका टीका भी साल-दर-साल बदलता जा रहा है।

ऐसे में, अगर आप किसी सांस संबंधी संक्रमण से गुजर रहे हैं, तो धैर्य रखते हुए अपने शरीर के प्रतिरोधी-तंत्र को उससे लड़ने के लिए कुछ मोहलत दीजिए। चार-पांच दिनों तक आम फ्लू की तरह ही उसका उपचार कराएं, न कि यह सोचकर अस्पताल भागें कि आप स्वाइन फ्लू से ग्रसित हो गए हैं। अगर बीमारी इससे ज्यादा समय तक खिंच जाती है और खांसी-जुकाम, बुखार, नाक बहना, सिरदर्द, बदन दर्द और थकान कायम रहे, तब आप किसी नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र में जरूर जाएं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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