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पत्रकार श्यामेन्द्र कुशवाहा का अपहरण नहीं नाटक हुआ

पत्रकार श्यामेन्द्र कुशवाहा का अपहरण नहीं हुआ था, बल्कि वह स्वयं वैराग्य की प्राप्ति के लिए घर-परिवार और अपना सब कुछ छोड़कर हरिद्वार चले गये थे। यह उनका बयान है पर पुलिस इसके पीछे लेन-देन को लेकर उपजे विवाद को कारण बता रही है। इस मसले पर अब तक दबाव में चल रही यूपी पुलिस अब उन लोगों को अपना निशाना बनाने जा रही है जिन्होंने इस मसले पर नेतागिरी की थी। डीाीपी विक्रम सिंह ने लखनऊ में पत्रकार वार्ता के दौरान खुलकर कहा कि इस मसले पर की गई राजनीति सिर्फ उत्तर प्रदेश सरकार को बेवजह बदनाम करने के लिए की गई। उन्होंने कहा कि मामले की पूरी जाँच के बाद अब ऐसे लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया जाएगा जिन्होंने साजिश रची।ड्ढr इससे पहले इलाहाबाद पुलिस लाइन में श्यामेन्द्र कुशवाहा ने पत्रकारों और पुलिस अधिकारियों के सामने उन्होंने बीस दिन पहले की अपनी मानसिक स्थिति के बार में बताया, जब से वह काफी परशान थे। उनका दिमाग हर वक्त इस दुनिया से वैराग्य लेने की ओर भाग रहा था। पांच-छह अप्रैल की रात वैराग्य लेने की स्थिति इतनी चरम पर पहुंच गयी कि वे अपने को रोक नहीं सके। रात एक बजे एक अन्य सहकर्मी एसएस खान से कहकर निकले कि कुछ देर में आते हैं। उसके बाद उन्होंने गार्ड के सामने स्कूटर से विंडचीटर निकाला और पैदल ही चल दिये। पैदल सिविल लाइन्स बस अड्डे से बस पकड़कर वे लखनऊ गये। वहां परशान हालत में घूमते हुए बस से ही हरिद्वार पहुंच गये। हर की पौड़ी पर पड़े रहे। नौ अप्रैल को वहां उन्हें एक स्वामी जगदीश्वरानंद मिले। उनकी मानसिक स्थिति को भांपकर स्वामी ने उन्हे समझाया।ड्ढr वह उन्हें ऋषिकेश ले गया। वहां से देवप्रयाग गये। 17 अप्रैल को वे हरिद्वार वापस आ गये। इस बीच उस स्वामी ने उनकी मन: स्थिति को ठीक किया और घर-परिवार और सामाजिक दायित्वों के बार में बताया। तब उनके भीतर से वैराग्य की बात हटी और उन्होंने हरिद्वार से घर फोनकर अपने अपहरण की कहानी गढ़ी। फोन पर श्यामेन्द्र ने कहा था कि बीस लाख और कुछ कागज के लिए मुकेश अग्रवाल ने उन्हें अगवा कर लिया है, जबकि ऐसा नहीं था। यह झूठ है। 1अप्रैल को वे दिल्ली पहुंचड्ढr गये।

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