DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

मैट्रिक स्तर पर अंग्रेजी की उपेक्षा

प्राइमरी स्तर पर ‘इंग्लिश क्ष फन’ और सेकेन्ड्री लेवल पर ‘फन विद इंग्लिश’! मतलब साफ है आठवीं तक के छात्रों को खेल-खेल में अंग्रेजी की शिक्षा देने की योजना चल रही है तो मैट्रिक में अंग्रेजी के साथ ‘खेल’ किया जा रहा है। इस स्तर पर अंग्रेजी विषय में पास होना जरूरी नहीं । सिर्फ परीक्षा देने की बाध्यता है। सरकार की इस दोहरी नीति से न तो छात्रों के साथ न्याय हो रहा है और न ही सरकारी उद्देश्य को मिल पा रहा है सही अंजाम।ड्ढr ड्ढr ‘न्याय के साथ विकास’ का नारा देने वाली सरकार भी ‘वोट की राजनीति’ में फंसी अंग्रेजी को मुक्त नहीं करा सकी। इसकी शुरुआत तो तब हुई थी जब राज्य की सत्ता पर पहली बार कपरूरी ठाकुर काबिज हुए थे। तब भी विकास पसंद लोगों ने इसे स्वीकार नहीं किया था । स्थिति को भांपकर मैट्रिक में अंग्रेजी को अनिवार्य किया गया।ड्ढr इसी बीच नई शिक्षा नीति लागू हुई और फिर यह अनिवार्यता समाप्त कर दी गई।ड्ढr इसकी खासियत यह है कि इसमें कोई ‘कपरूरी डिवीजन’ (पास विदाउट इंग्लिश)रहा ही नहीं कि अंग्रेजी विषय में फेल छात्रों की पहचान हो सके। सबके लिए समान व्यवस्था। आईटी के महत्व को समझने वाली नीतीश सरकार में अंग्रेजी का महत्व भी समझा जाने लगा है।ड्ढr प्राथमिक स्तर पर बच्चों को रडियो के माध्यम से अंग्रेजी सिखाने की व्यवस्था हर स्कूल में की गई है। लेकिन यह व्यवस्था ‘ए फॉर एपल’ सीखने तक ही सीमित है। यदि यह अपने प्रारंभिक मकसद में कामयाब होती भी है तो मैट्रिक स्तर पर इस विषय के प्रति जसी सरकारी उपेक्षा अब भी बदस्तूर जारी है उससे तो प्राथमिक स्तर पर भी इंग्लिश के मात्र फन बनकर ही रह जाने की संभावना ज्यादा दिखती है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: मैट्रिक स्तर पर अंग्रेजी की उपेक्षा