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यहाँ भी सुरक्षित भूमि घोटाला

जिले में बड़े पैमाने पर सुरक्षित भूमि आवंटन घोटाला सामने आया है। सरकार के आदेश पर इस घोटाले में लेखपाल से लेकर एसडीएम तक की भूमिका सामने आई है। छोटे से बड़े कर्मचारियों ने मजींदारी विनाश अधिनियम के प्रावधानों को उल्लंघन करके सुरक्षित भूमि के पट्टे आवंटित कर दिए। अब तक करीब छह सौ से अधिक पट्टे निरस्त कर छह सौ बीघे भूमि कब्जे से मुक्त कराने का आदेश तो जिला और अपर जिला मजिस्ट्रेट के न्यायालयों से जारी हो चुका है, लेकिन सीमा रखा लांघकर सुरक्षित भूमि आवंटित करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई प्रस्तावित नहीं की गई है। अधिकारियों के इस रवैए से लोग हतप्रभ हैं। इनका कहना है कि गलत तरीके से सुरक्षित भुूमि आवंटित करने वालों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होनी ही चाहिए।ड्ढr जमींदारी विनाश अधिनियम-1में व्यवस्था है कि ग्राम सभा की सुरक्षित जमीनों को पट्टे पर नहीं दिया जा सकता। व्यवस्था यह भी है कि सुरक्षित भूमि का उपयोग भी नहीं बदला जा सकता। इस व्यवस्था को दरकिनार कर पिछले वर्षो में लेखपाल की रिपोर्ट पर आँख मूँद कर भरोसा करके कई उपजिलाधिकारियों ने तालाब की सुरक्षित भूमि चहेतों और किसानों को पट्टे पर दे दी।ड्ढr बसपा सरकार बनने के बाद सुरक्षित जमाीनों से अवैध कब्जे अवाने का अभियान शुरू किया गया। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर तालाब को पुरानी शक्ल में वापस लाने के प्रयास प्रारंभ हुए। प्रशासन द्वारा शुरू किए गए प्रयासों ने रंग दिखाया और अक्टूबर से लेकर मार्च तक (छह माह) तालाबों की करीब छह सौ बीघे भूमि पर अवैध रूप से हुए पट्टे जिला मजिस्ट्रेट, अपर जिला मजिस्ट्रेट(वित्त एवं राजस्व) और अपर जिला मजिस्ट्रेट (प्रशासन) की अदालत द्वारा निरस्त किए जा चुके हैं। इन मजिस्ट्रेटों ने पट्टे निरस्त कर कब्जा हटवाने के भी आदेश किए, लेकिन अब तक ऐसे निरस्त पट्टों की भूमि से कब्जा हटवाने की कोई खबर नहीं है। अधिनियम के प्रावधानों को तोड़कर तालाब की सुरक्षित भूमि का पट्टा करने वाले छोटे-बड़े कर्मियों पर कोई कार्रवाई भी अमल में नहीं लाई गई।ं

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