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31 मार्च, 2020|3:39|IST

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इतिहास की गलियों में भटकरहे दो देश

पिछले दिनों जब जापान के विदेश मंत्री फूमियो किशिदा भारत आए थे,  तब उन्होंने विदेश नीति से जुड़ी नई दिल्ली की प्रसिद्ध संस्था ‘इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स’  को संबोधित करते हुए कहा था कि दक्षिण चीन सागर के विवाद को सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री शिंजो एबे के सिद्धांत को माना जाए। शिंजो एबे का सिद्धांत है कि समुद्री क्षेत्र में अपना दावा करने के लिए बल और दबाव का इस्तेमाल न किया जाए। किशिदा ने कहा कि समुद्री सुरक्षा को लेकर भारत व जापान के बीच आपसी सहयोग में वृद्धि हुई है। इसमें और बढ़ोतरी की जरूरत है। किशिदा ने कहा कि जापान,  भारत के साथ समुद्री सुरक्षा सहयोग बढ़ाना चाहता है। चीन की बढ़ती आक्रामकता पर नियंत्रण पाने के लिए यह आवश्यक है।

हिंद महासागर से दक्षिण चीन सागर होते हुए प्रशांत महासागर तक के क्षेत्र में भारत और जापान के बड़े पैमाने पर हित निहित हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी जापान यात्रा में कहा था कि समुद्री मार्ग सबके लिए स्वतंत्र होने चाहिए। चीन को मोदी का यह बयान पसंद नहीं आया था। चीन और जापान में ‘ईस्ट चाइना सी’  में सेनकाकु द्वीप को लेकर भी विवाद है। तेल और गैस की असीम संभावनाओं वाले इस द्वीप पर अरसे से जापान का अधिकार है, परंतु दादागिरी दिखाने के चक्कर में चीन उस पर अपना आधिपत्य जमा रहा है।

आगामी कुछ महीनों में चीन और जापान के बीच तनातनी बढ़ने की पूरी आशंका है। दरअसल,  अगस्त महीने में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति की 70वीं वर्षगांठ मनाई जाएगी। उसे लेकर अभी से चीन में जापान के खिलाफ दुर्भावनाएं भड़काई जा रही हैं। चीन और जापान के कटु संबंधों में एक नया मोड़ ‘कम्फर्ट वीमेन’ को लेकर आ गया है। चीन का कहना है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान के दुर्दांत सैनिक संभ्रांत घरों की महिलाओं को जबरन उठाकर अपने कैंपों में ले जाते थे और उनसे वेश्यावृत्ति कराते थे। इन महिलाओं को ‘कम्फर्ट वीमेन’ का नाम दिया गया था।

विश्व युद्ध की समाप्ति पर ऐसी महिलाओं को जापानियों ने गोलियों से उड़ा दिया था, ताकि उनका अता-पता नहीं चल सके। चीन का कहना है कि ऐसी हजारों महिलाओं को जापानी सैनिक उठाकर ले गए थे। इसलिए जापान इसके लिए माफी मांगे और पर्याप्त मुआवजा दे। जापान का कहना है कि पश्चिम के इतिहासकारों ने इस बारे में बढ़ा-चढ़ाकर लिखा है। इसमें यदि थोड़ी-बहुत सच्चाई है भी,  तो जापान ने 1965 में ही इसके लिए चीन से माफी मांग ली थी और उसी समय यह तय हो गया था कि जापान चीन को मुआवजे में कितनी रकम देगा। पर चीन इसे नहीं मान रहा। चीन और जापान,  दोनों देशों में विभिन्न मुद्दों और अपनी-अपनी सुरक्षा को लेकर तनातनी बढ़ती ही जा रही है। स्थिति अत्यंत विस्फोटक है और कभी भी एक चिनगारी से विस्फोट हो सकता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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